शरद कटियार
किसी भी प्रदेश के विकास का वास्तविक पैमाना केवल सड़कें, पुल, उद्योग और आर्थिक आंकड़े नहीं होते। किसी समाज का भविष्य इस बात से तय होता है कि उसके बच्चे कितने स्वस्थ, मजबूत और सुरक्षित होकर बड़े हो रहे हैं। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन की दर 39.7 प्रतिशत से घटकर 31.5 प्रतिशत होना निश्चित रूप से ध्यान देने योग्य बदलाव है। करीब चार वर्षों में 8.2 प्रतिशत अंक की कमी यह संकेत देती है कि मातृ-शिशु स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े प्रयासों का असर दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के बीच यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नाटापन महज बच्चे की लंबाई का सवाल नहीं है। इसके पीछे लंबे समय तक रहने वाला पोषण अभाव, गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य, जन्म के बाद शिशु की देखभाल, स्तनपान, पूरक आहार और बार-बार होने वाले संक्रमण जैसे अनेक कारण जुड़े होते हैं। इसलिए किसी बच्चे की बेहतर वृद्धि वास्तव में परिवार और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के बेहतर काम करने का परिणाम होती है।
लेकिन 31.5 प्रतिशत का आंकड़ा हमें पूरी तरह संतुष्ट होने की अनुमति नहीं देता। इसका अर्थ है कि हर 100 में लगभग 32 बच्चे अभी भी नाटेपन की समस्या से प्रभावित हैं। इसलिए उपलब्धि को अंतिम सफलता मानने के बजाय इसे आगे की रणनीति का आधार बनाना होगा।
सबसे अधिक ध्यान जीवन के उन शुरुआती वर्षों पर देना जरूरी है, जिन्हें विशेषज्ञ बच्चे के विकास की बुनियाद मानते हैं। गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दो वर्ष की उम्र तक का समय शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में मां और बच्चे का पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, स्तनपान और समय पर पूरक आहार सीधे तौर पर बच्चे के विकास से जुड़े हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में पोषण अभियान की सफलता केवल सरकारी योजनाओं के बजट या घोषणाओं से नहीं, बल्कि आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचने वाले वास्तविक लाभ से तय होगी। प्रदेश में लगभग 1.45 लाख को-लोकेटेड और 0.44 लाख नॉन-को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों पर करीब 32.88 लाख बच्चों को हॉट कुक्ड मील योजना का लाभ मिलने का दावा किया गया है। ऐसे कार्यक्रम तभी अधिक प्रभावी होंगे जब भोजन की गुणवत्ता, नियमितता और बच्चों की वास्तविक पोषण स्थिति की लगातार निगरानी हो।
इसके साथ गर्भवती महिलाओं तक पोषण संबंधी जानकारी पहुंचाना, एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान, छह माह तक केवल स्तनपान, इसके बाद उचित पूरक आहार तथा बच्चों की नियमित वृद्धि की निगरानी को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा।
बच्चे के पोषण की पहली इकाई परिवार है। इसलिए सरकारी योजनाओं के साथ माता-पिता और समुदाय की जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केवल भोजन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है; बच्चे को क्या, कितना और किस उम्र में दिया जा रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसी तरह स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई, संक्रमण से बचाव और समय पर इलाज को पोषण नीति से अलग नहीं किया जा सकता। बार-बार बीमार पड़ने वाला बच्चा पर्याप्त भोजन मिलने के बावजूद अपेक्षित विकास नहीं कर पाता।
उत्तर प्रदेश में नाटेपन में आई कमी सकारात्मक संकेत है, लेकिन असली सफलता उस दिन मानी जाएगी जब हर बच्चे को जीवन के शुरुआती वर्षों में पौष्टिक भोजन, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और विकास का समान अवसर उपलब्ध हो।
राष्ट्रीय पोषण माह को केवल जागरूकता अभियानों तक सीमित रखने के बजाय इसे मां के पोषण से लेकर बच्चे की नियमित वृद्धि की निगरानी तक एक सतत अभियान बनाना होगा। आंकड़ों में सुधार उत्साह देता है, लेकिन 31.5 प्रतिशत की मौजूदगी यह भी याद दिलाती है कि पोषण की लड़ाई अभी लंबी है।नौनिहालों की कद-काठी में सुधार भविष्य की मजबूत नींव है। अब चुनौती यह है कि यह सुधार कुछ आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रदेश के हर गांव, हर परिवार और हर बच्चे तक पहुंचे।


