परिकल्पना एवं संपादन: मोहम्मद आक़िब खांन
प्रस्तुति: यूथ इंडिया
फर्रुखाबाद: धम्मचक्र की पावन ध्वनियों और सम्राट अशोक की ऐतिहासिक विरासत को समेटे फर्रुखाबाद का ‘संकिसा’ (प्राचीन संकाश्य) केवल पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि विश्व बौद्ध चेतना का जाज्वल्यमान नक्षत्र है। बौद्ध मतावलंबियों के आठ सबसे पवित्र धामों (अष्टमहास्थान) में विशिष्ट स्थान रखने वाली यह माटी आध्यात्मिक आस्था और ईसा पूर्व के स्थापत्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है…
देवलोक से अवतरण की पौराणिक कथा
बौद्ध ग्रंथों और पालि साहित्य के अनुसार, भगवान बुद्ध ने अपनी माता महामाया को धर्म-उपदेश देने के लिए त्रिदश देवलोक (स्वर्ग) में तीन माह का कल्पवास किया था। उपदेश पूर्ण होने के पश्चात, आश्विन पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध संकिसा की इसी पवित्र भूमि पर देवलोक से सीधे अवतरित हुए थे। मान्यताओं के अनुसार, उनके अवतरण के लिए देवराज इंद्र और ब्रह्मा जी ने सोने, चाँदी और मणियों की तीन सीढ़ियाँ निर्मित की थीं। इसी घटना के स्मरण में आज भी प्रतिवर्ष संकिसा में विशाल ‘दीक्षा दिवस’ और अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन आयोजित होता है, जिसमें श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और तिब्बत से हज़ारों बौद्ध श्रद्धालु आते हैं।
पुरातात्विक अवशेष और सम्राट अशोक का गज-स्तंभ
संकिसा का पुरातात्विक महत्व 3वीं शताब्दी ईसा पूर्व से स्पष्ट दिखाई देता है। महान मौर्य सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के अवतरण स्थल को अमर बनाने के लिए यहाँ बलुआ पत्थर से निर्मित एकाश्म स्तंभ स्थापित कराया था। इस स्तंभ के शीर्ष पर गज (हाथी) की आकृति उत्कीर्ण है, जो बौद्ध कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। 7वीं शताब्दी में आए प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग और 5वीं शताब्दी के फाह्यान ने अपने यात्रा वृत्तांतों में संकिसा के भव्य मठों, भिक्षुओं की साधना और विशाल स्तूपों का विशद वर्णन किया है। ह्वेनसांग के अनुसार, संकिसा में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित सीढ़ियों के अवशेष और प्राचीन संघाराम उस दौर की स्थापत्य कला व बौद्ध अध्ययन के महान केंद्र थे।
आज संकिसा केवल अतीत का अध्याय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर फर्रुखाबाद की वैश्विक पहचान है। यहाँ का प्राचीन किला, बौद्ध स्तूप के भग्नावशेष और विभिन्न देशों द्वारा निर्मित आधुनिक बौद्ध विहार इस स्थान के धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व को जीवंत बनाए रखते हैं।


