बिहार में जदयू ने लागू नहीं होने देने का ऐलान किया
नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर एनडीए के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आने लगी है। तेलुगु देशम पार्टी, शिंदे गुट की शिवसेना और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा ने यूसीसी का समर्थन किया है, जबकि बिहार में जदयू ने साफ कर दिया है कि वह राज्य में इसे लागू नहीं होने देगा। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित 21 राज्यों में यूसीसी लागू करने के बयान के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है।
फिलहाल एनडीए की 22 राज्यों में सरकारें हैं और उत्तराखंड में जनवरी 2025 से यूसीसी लागू है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी यूसीसी से जुड़े विधेयक विधानसभा से पारित हो चुके हैं। अब इन राज्यों में राष्ट्रपति की मंजूरी और अधिसूचना जारी होने का इंतजार है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में यूसीसी को लेकर कानून तैयार करने के लिए समितियां गठित की गई हैं।
टीडीपी के लोकसभा नेता लावू कृष्ण देवरायुलु ने कहा कि उनकी पार्टी यूसीसी का समर्थन करेगी, लेकिन इसे लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से बातचीत जरूरी है। वहीं जदयू नेता श्याम रजक ने कहा कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी का समर्थन करती है, लेकिन बिहार में इसे लागू नहीं होने देगी। जदयू नेता संजय झा इस मुद्दे पर अमित शाह से मुलाकात करेंगे।
शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने यूसीसी को समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हुए समर्थन किया है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने भी अमित शाह के बयान का स्वागत किया। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि एनडीए के सभी दल यूसीसी पर सहमत नहीं हैं और यदि भाजपा के पास संसद में बहुमत है तो उसे वहीं कानून लाना चाहिए।
केरल की मुस्लिम संस्था समस्त केरल जेम-इयातुल उलमा ने भी यूसीसी का विरोध किया है। संस्था का कहना है कि विवाह, तलाक और विरासत जैसे विषय विभिन्न समुदायों की धार्मिक व्यवस्थाओं से जुड़े हैं। यूसीसी का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून बनाना है, जबकि धार्मिक पूजा-पद्धति और आस्था से जुड़े मामलों पर इसका सीधा प्रभाव नहीं माना जाता। किसी राज्य में इसे लागू करने के लिए विधानसभा से विधेयक पारित होने, राज्यपाल की मंजूरी और अधिसूचना जारी होना जरूरी होगा।


