शरद कटियार
न्याय व्यवस्था किसी भी लोकतंत्र की वह कसौटी है, जिस पर शासन की संवेदनशीलता, संविधान की गरिमा और नागरिकों के अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा परखी जाती है। अदालतें केवल भवनों, कानूनों और प्रक्रियाओं से नहीं चलतीं। उनके केंद्र में न्याय पाने की उम्मीद लेकर पहुंचने वाला वह आम नागरिक होता है, जिसके लिए न्याय में देरी कई बार न्याय से वंचित होने के समान हो जाती है। इसलिए उत्तर प्रदेश में न्यायिक ढांचे को मजबूत करने और अधिवक्ताओं की सुविधाओं में विस्तार की घोषणाओं को केवल सरकारी सौगात के रूप में नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की व्यापक जरूरतों के संदर्भ में देखना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से अधिवक्ताओं के लिए पांच लाख रुपये तक की वार्षिक कैशलेस चिकित्सा बीमा सुविधा, चैंबरों में फर्नीचर और उपकरणों के लिए सरकारी सहयोग, राज्य विधि अधिकारियों को टैबलेट तथा उनकी फीस में उल्लेखनीय वृद्धि जैसी घोषणाएं निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। अधिवक्ता न्याय व्यवस्था की अग्रिम पंक्ति में काम करते हैं। उनके लिए बेहतर कार्य परिस्थितियां उपलब्ध होना अंततः न्याय पाने वाले व्यक्ति के हित में ही है।
लेकिन इस अवसर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश सुविधाओं से कहीं आगे जाता है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि भविष्य के लिए तैयार बार ही भविष्य की न्याय व्यवस्था की मजबूत नींव रख सकती है, वास्तव में न्याय व्यवस्था की बदलती प्रकृति की ओर संकेत करता है। कानून की दुनिया अब केवल कागजी दस्तावेजों और पारंपरिक अदालती बहस तक सीमित नहीं रही। साइबर अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल लेनदेन, आंकड़ों की निजता, बौद्धिक संपदा और पर्यावरणीय मुकदमों जैसी नई चुनौतियां सामने हैं। ऐसे में अधिवक्ताओं को भी समय के साथ अपनी विशेषज्ञता और तकनीकी समझ विकसित करनी होगी।
परंतु केवल तकनीक उपलब्ध करा देने से न्याय आधुनिक नहीं हो जाता। उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना भी उतना ही आवश्यक है। अदालतों का डिजिटलीकरण, वीडियो कांफ्रेंसिंग, दस्तावेजों की स्कैनिंग और आभासी माध्यम से गवाही जैसी व्यवस्थाएं तभी सार्थक होंगी, जब उनका लाभ प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले उस व्यक्ति तक पहुंचे, जो महंगी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया के कारण अक्सर अपने अधिकारों की लड़ाई बीच में छोड़ देता है।
उत्तर प्रदेश में न्यायिक ढांचे की पुरानी कमियों को दूर करने की दिशा में हुए काम भी महत्वपूर्ण हैं। जिला अदालतों के लिए बेहतर भवन, अधिवक्ता चैंबर, पार्किंग, पुस्तकालय, भोजनालय और अन्य सुविधाएं न्यायिक वातावरण को व्यवस्थित बनाने में मदद करती हैं। प्रयागराज में हजारों अधिवक्ताओं के लिए चैंबरों का निर्माण इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। मगर भवन निर्माण के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन संसाधनों का रखरखाव और उनका पारदर्शी उपयोग लगातार होता रहे।
बार और बेंच के रिश्ते को लेकर भी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। न्याय का रथ तभी आगे बढ़ सकता है, जब उसके दोनों पहिए—अधिवक्ता और न्यायाधीश—एक-दूसरे के प्रति सम्मान, मर्यादा और सहयोग की भावना से काम करें। मतभेद न्यायिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन टकराव न्याय के हित में नहीं हो सकता। अदालत में असहमति हो सकती है, बहस तीखी हो सकती है, लेकिन संस्थागत गरिमा और नागरिक के न्याय के अधिकार से समझौता नहीं होना चाहिए।
अधिवक्ताओं के कल्याण की घोषणाएं भी इसी व्यापक दृष्टि से देखी जानी चाहिए। अधिवक्ता कल्याण निधि की राशि बढ़ाना और निधन की स्थिति में परिजनों को सहायता की पात्रता आयु बढ़ाना मानवीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में युवा अधिवक्ता सीमित संसाधनों के साथ अपने पेशे की शुरुआत करते हैं। उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक अवसरों का विस्तार जरूरी है। अधिवक्ता केवल न्यायालय में बहस करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु है।
इसीलिए अधिवक्ता समाज से भी अपेक्षा कम नहीं होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में बार की जिम्मेदारी सरकार जितनी ही महत्वपूर्ण है। अधिवक्ताओं को नए कानूनों की जानकारी, तकनीकी दक्षता, पेशेवर अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। मुकदमा जीतना पेशे की सफलता हो सकती है, लेकिन न्याय के प्रति ईमानदारी उसकी असली कसौटी है।
सरकार के लिए भी चुनौती स्पष्ट है। न्यायिक ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च करना पहला कदम है, अंतिम उपलब्धि नहीं। असली सफलता तब मानी जाएगी जब अदालतों में लंबित मामलों का बोझ घटे, मुकदमों के निस्तारण में तेजी आए, गवाह सुरक्षित महसूस करें, अभियोजन प्रभावी हो और आम नागरिक को न्याय पाने के लिए वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।
न्याय व्यवस्था में पुलिस, अभियोजन, अदालत और अधिवक्ता अलग-अलग कड़ियां नहीं बल्कि एक ही श्रृंखला के हिस्से हैं। इनमें किसी एक कड़ी की कमजोरी पूरी व्यवस्था को प्रभावित करती है। इसलिए पुलिस सुधार, अभियोजन की गुणवत्ता, वैज्ञानिक साक्ष्यों का उपयोग, सुरक्षित गवाह व्यवस्था और न्यायालयों में पर्याप्त मानव संसाधन को समान प्राथमिकता देनी होगी।
आज जब देश नई तकनीकी और सामाजिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है, तब न्याय व्यवस्था को भी भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढालना समय की मांग है। मगर इस बदलाव का केंद्र केवल तकनीक या इमारतें नहीं होनी चाहिएं। केंद्र में संविधान, नागरिक और उसका न्याय पर विश्वास होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती और अवसर है। यदि बेहतर बुनियादी ढांचे के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता, पेशेवर दक्षता और समयबद्ध न्याय को भी प्राथमिकता मिलती है, तो अधिवक्ताओं के लिए की गई घोषणाएं केवल सुविधाओं का विस्तार नहीं रहेंगी, बल्कि प्रदेश की न्याय व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन की आधारशिला बन सकती हैं।
न्याय की मजबूती अंततः इमारतों से नहीं, उस भरोसे से तय होती है जो आम नागरिक को अदालत की चौखट तक पहुंचने और वहां से न्याय लेकर लौटने की उम्मीद देता है।अगर चाहें तो मैं इसी संपादकीय का और अधिक तीखा, राजनीतिक विश्लेषण वाला संस्करण भी तैयार कर सकता हूं।


