– मोदी के भोज में सत्ता पक्ष के छह मुख्यमंत्री मौजूद
– चार विपक्षी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को निमंत्रण के बावजूद दूरी
– राहुल-खरगे को न्योता न मिलने पर चर्चाएं गर्म
शरद कटियार
नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने जहां वैश्विक कूटनीति में भारत की भूमिका को मजबूती दी, वहीं सम्मेलन से जुड़े घरेलू राजनीतिक प्रोटोकॉल ने भी नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आयोजित ब्रिक्स के भव्य रात्रिभोज में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की गैरमौजूदगी महज अनुपस्थिति नहीं, बल्कि निमंत्रण को लेकर सवाल का विषय बन गई है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों नेताओं को ब्रिक्स सम्मेलन अथवा प्रधानमंत्री के भोज के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सरकार से जुड़े सूत्रों के अनुसार केरल, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे विपक्ष शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के भोज का निमंत्रण भेजा गया था। इन मुख्यमंत्रियों ने कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया। तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश की ओर से पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला दिया गया।
छह भाजपा मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी
प्रधानमंत्री के भोज में भाजपा शासित राज्यों के छह मुख्यमंत्री शामिल हुए। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस, पश्चिम बंगाल के सुवेंदु अधिकारी, असम के हिमंत बिस्वा सरमा, उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता शामिल थीं।
यानी राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आंकड़ा देखें तो भोज में भाजपा शासित राज्यों के 6 मुख्यमंत्री मौजूद रहे, जबकि आमंत्रित विपक्षी राज्यों के 4 मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे। इस वजह से कार्यक्रम की तस्वीर पर राजनीतिक रंग चढ़ना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल राहुल गांधी की अनुपस्थिति को लेकर है। वे वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत की ओर से सरकार के साथ विपक्ष की संस्थागत उपस्थिति का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष का पद संसद की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक-संसदीय भूमिका रखता है।
दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी सम्मेलन के दौरान पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों से दूर नहीं रहे। उन्होंने ब्रिक्स में आए मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से नाश्ते पर मुलाकात की और भारत-मलेशिया संबंधों तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की।
इस पूरे घटनाक्रम की तुलना 2023 के जी-20 रात्रिभोज से भी की जा रही है। उस समय भी कई विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आयोजित जी-20 भोज में हिस्सा नहीं लिया था। रिपोर्टों के अनुसार कर्नाटक के सिद्धारमैया, तेलंगाना के के. चंद्रशेखर राव, आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी, केरल के पिनराई विजयन, राजस्थान के अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल और ओडिशा के नवीन पटनायक जैसे नेता कार्यक्रम में नहीं पहुंचे थे।
लेकिन 2026 के ब्रिक्स प्रकरण में नया सवाल यह है कि विपक्ष के मुख्यमंत्रियों और संसद के नेता प्रतिपक्ष के लिए प्रोटोकॉल एक जैसा क्यों नहीं दिखाई दिया?
ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने 45 पन्नों के संयुक्त घोषणा-पत्र के जरिए वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों की भूमिका और आतंकवाद सहित कई मुद्दों पर साझा रुख सामने रखा। सम्मेलन में चीन, रूस समेत ब्रिक्स के प्रमुख देशों के शीर्ष नेता शामिल हुए।
ऐसे में विदेश नीति के इस बड़े मंच पर भारत की आंतरिक राजनीतिक एकजुटता भी प्रतीकात्मक महत्व रखती है। सरकार के समर्थक इसे प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार और आयोजन के प्रोटोकॉल से जोड़ सकते हैं, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक परंपराओं और संस्थागत संवाद के नजरिये से देख रहा है।
एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि खुद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी प्रधानमंत्री मोदी के भोज में शामिल नहीं हुए। चीन की ओर से विदेश मंत्री वांग यी ने प्रतिनिधित्व किया। अब यह स्पष्ट है कि किसी नेता की भोज में गैरमौजूदगी को अकेले राजनीतिक संकेत मानना उचित नहीं होगा।
इसलिए ब्रिक्स भोज की कहानी केवल कौन आया और कौन नहीं आया तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि दुनिया के सामने भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत के साथ क्या घरेलू लोकतांत्रिक संवाद भी उसी अनुपात में मजबूत हो रहा है?
ब्रिक्स में भारत ने दुनिया को साथ लाने की कोशिश की, लेकिन देश के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच प्रोटोकॉल की दूरी ने एक अलग तस्वीर जरूर पेश की। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।


