डॉ. विजय गर्ग
फैशन की एक अजीब खूबी है—वह समय की यात्रा करता रहता है। 1980 के दशक में लोकप्रिय रहे चमकीले रंग, ढीले कपड़े, डेनिम, रेट्रो डिज़ाइन, पुराने अंदाज़ की हेयरस्टाइल और विंटेज एक्सेसरीज़ आज फिर फैशन में लौट रही हैं। जो चीज़ कभी पुरानी मानी जाती थी, वही आज स्टाइलिश और आधुनिक कहलाने लगी है।
लेकिन इस वापसी के पीछे एक दिलचस्प सवाल छिपा है—अगर 1980 का फैशन लौट सकता है, तो उस दौर का बचपन क्यों नहीं लौट सकता?
1980 का दशक आज से बहुत अलग था। उस समय बचपन स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन कक्षाओं और लगातार डिजिटल मनोरंजन से लगभग मुक्त था। बच्चे अधिक समय घर से बाहर बिताते थे। वे पारंपरिक खेल खेलते, साइकिल चलाते, दोस्तों के घर जाते और परिवार के साथ छोटी-छोटी खुशियाँ साझा करते थे।
खेल का मैदान महंगे उपकरणों के बिना भी कल्पना की पूरी दुनिया बन सकता था। एक गेंद, साइकिल, पतंग या कुछ दोस्त ही घंटों की खुशी के लिए पर्याप्त होते थे। बच्चे अपने खेल खुद बनाते थे और प्रत्यक्ष मेल-जोल के माध्यम से सहयोग, धैर्य और दोस्ती सीखते थे।
आज बच्चों के पास अद्भुत तकनीक उपलब्ध है। स्मार्टफोन, टैबलेट, वीडियो गेम और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म मनोरंजन के साथ-साथ ऐसी शैक्षिक सुविधाएँ भी देते हैं, जिनकी पिछली पीढ़ियाँ कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। तकनीक ने सीखने को तेज और संचार को आसान बनाया है। लेकिन इसने बचपन के स्वरूप को भी बदल दिया है।
आज कई बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बिताते हैं। दोस्तों से आमने-सामने मिलने के बजाय वे संदेशों या ऑनलाइन गेम के माध्यम से बातचीत करते हैं। बाहर दौड़ने और खेलने के बजाय वे घर के अंदर रहना पसंद कर सकते हैं। परिणाम यह है कि बच्चे डिजिटल दुनिया से अधिक जुड़े हुए हैं, लेकिन प्रकृति, पड़ोस और कभी-कभी अपने परिवार से भी कम जुड़ते जा रहे हैं।
यह केवल पुराने और नए के बीच का अंतर नहीं है। हर पीढ़ी की अपनी खूबियाँ और सीमाएँ होती हैं। वास्तविक चिंता संतुलन की है।
हमें 1980 के दशक को आदर्श बनाकर यह नहीं कहना चाहिए कि उस समय सब कुछ बेहतर था। उस दौर की अपनी सीमाएँ भी थीं। शिक्षा, संचार और जानकारी तक पहुँच आज जितनी सुविधाजनक नहीं थी। आधुनिक तकनीक ने हमें अनेक महत्वपूर्ण लाभ दिए हैं और उसे नकारा नहीं जाना चाहिए।
लेकिन उस दौर के बचपन के कुछ मूल्यों को हम अवश्य वापस ला सकते हैं।
हम बच्चों को बाहर खेलने, किताबें पढ़ने, दादा-दादी और नाना-नानी के साथ समय बिताने, परिवार के साथ बातचीत करने, प्रकृति को जानने और स्क्रीन से अलग अपनी रुचियाँ विकसित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। डिजिटल उपकरणों से कुछ घंटे दूर रहना बच्चों की कल्पना, रचनात्मकता और वास्तविक मानवीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर सकता है।
रेट्रो फैशन की वापसी हमें याद दिलाती है कि समाज अक्सर प्रेरणा के लिए अतीत की ओर देखता है। शायद हमें बचपन के मामले में भी ऐसा ही करना चाहिए—अतीत की हर चीज़ वापस लाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सादगी और सहजता को फिर से अपनाने के लिए।
फैशन वापस आ सकता है, क्योंकि कपड़ों को फिर से डिजाइन किया जा सकता है। लेकिन बचपन उसी रूप में वापस नहीं आ सकता, क्योंकि समय हमेशा आगे बढ़ता है। फिर भी पुराने बचपन से जुड़ी खुशी, जिज्ञासा, स्वतंत्रता, दोस्ती और सरलता को आज भी सुरक्षित रखा जा सकता है।
इसलिए वास्तविक चुनौती 1980 के दशक को दोहराना नहीं है। चुनौती है ऐसा आधुनिक बचपन तैयार करना, जिसमें तकनीक की श्रेष्ठ सुविधाओं के साथ मानवीय संबंधों के शाश्वत मूल्य भी मौजूद हों।
1980 के दशक के कपड़े फिर फैशन में आ सकते हैं। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि आज के बच्चे भी बचपन की वास्तविक समृद्धि का अनुभव करें, तो हमें पुराने फैशन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चीज़ वापस लानी होगी—खेलने, कल्पना करने, खोजने और बस बच्चा बने रहने की स्वतंत्रता।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् एवं प्रख्यात गणितज्ञ
स्ट्रीट कौर चंद, मालोट, पंजाब–152107
मोबाइल: 9465682110


