– मंच शुद्धिकरण से शुरू हुई राजनीति अब वोट बैंक की नई पटकथा बनती जा रही है। सवाल दलित, पिछड़े या किसी एक जाति के सम्मान का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो समाज को बांटकर राजनीतिक लाभ तलाश रही है।
सूर्या पंडित
डिप्टी एडिटर यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप
भारतीय राजनीति में मुद्दों की कमी कभी नहीं रही, लेकिन अब चिंता इस बात की है कि सामाजिक संवेदनाओं को भी राजनीतिक अवसर में बदलने का सिलसिला तेज होता जा रहा है। मल्लिकार्जुन खड़गे के मंच के शुद्धिकरण से शुरू हुआ विवाद अब ऐसा राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है, जिस पर अलग-अलग दल अपने-अपने तरीके से राजनीति साधने में जुटे हैं।
हर मंच से एक ही सवाल उठाया जा रहा है—दलितों का अपमान हुआ। निस्संदेह, किसी भी व्यक्ति का जाति के आधार पर अपमान स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे का कोई स्थायी समाधान चाहते हैं या फिर इसे केवल अपनी-अपनी राजनीति और वोट बैंक मजबूत करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं?
अगर समाज में जातिगत भेदभाव मौजूद है तो उसका समाधान भाषणों से नहीं, बल्कि सामाजिक सोच बदलने से होगा। मंच पर खड़े होकर बार-बार किसी जाति का नाम लेना और फिर भीड़ के बीच भाषण देकर चले जाना आसान है, लेकिन उस मानसिकता को बदलना कठिन है जो इंसान को इंसान से उसकी जाति के आधार पर अलग करती है।
राजनीति तब सार्थक होती है जब वह समस्या को समाधान तक ले जाए। लेकिन आज स्थिति यह है कि कोई हिंदू समाज के खतरे की बात कर रहा है, कोई किसी जाति के खतरे की, कोई किसी वर्ग के अधिकारों की। हर कोई अपने हिस्से की राजनीति को मजबूत करने में लगा है। मगर सवाल यह है कि हिंदुस्तान के खतरे की बात कौन करेगा?
कभी-कभी छोटी-सी बात बड़ी सच्चाई सामने ला देती है। फिल्म खट्टा मीठा का वह संवाद याद आता है, जिसमें देश की विविध जातियों और समुदायों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया था कि इन सबके बीच ‘हिंदुस्तानी’ आखिर कहां है। आज वह बात व्यंग्य नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और राजनीतिक वातावरण पर गंभीर सवाल जैसी लगती है।
जाति और धर्म हमारी पहचान का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उन्हें इंसानियत से बड़ा बना देना खतरनाक है। यदि किसी दलित के साथ भेदभाव होता है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। यदि किसी पिछड़े, सवर्ण, अल्पसंख्यक या किसी भी वर्ग के साथ अन्याय होता है तो उसके खिलाफ भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होना चाहिए। न्याय की कोई जाति नहीं होती और सम्मान का कोई धर्म नहीं होता।
दुखद यह है कि राजनीतिक दल अक्सर समाज की दरारों को भरने के बजाय उन्हीं दरारों में अपनी राजनीति तलाशते दिखाई देते हैं। कोई जाति को अपना वोट बैंक मानता है तो कोई धर्म को। कोई एक वर्ग को खतरे में बताता है तो कोई दूसरे वर्ग को। इस राजनीति में जनता धीरे-धीरे नागरिक कम और वोट बैंक ज्यादा बनती जा रही है।
हमें यह समझना होगा कि जाति खतरे में नहीं है, धर्म खतरे में नहीं है—हमारी सामाजिक सोच खतरे में है। जब हम अपनी पहचान को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने में लग जाते हैं, तब देश कमजोर होता है।
भारत की ताकत उसकी विविधता रही है। यहां अलग-अलग जातियां, भाषाएं, धर्म और संस्कृतियां सदियों से साथ रहती आई हैं। इसलिए जरूरत किसी एक जाति या धर्म को बचाने की नहीं, बल्कि उस भारतीय भावना को बचाने की है जो इन सबको जोड़ती है।
राजनीति को सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन समाज को बांटने का अधिकार नहीं। नेताओं को आवाज उठानी चाहिए, मगर उस आवाज का लक्ष्य वोट नहीं, समाधान होना चाहिए।
आखिर कब तक हम जाति और धर्म के नाम पर एक-दूसरे को नीचा दिखाकर खुश होते रहेंगे?
याद रखिए—
जातियों में बंटकर कोई समाज मजबूत नहीं होता, धर्म के नाम पर बंटकर कोई देश मजबूत नहीं होता।
हमें प्रेम अपनी जाति से हो सकता है, अपनी आस्था से हो सकता है, लेकिन सबसे ऊपर प्रेम हिंदुस्तान से होना चाहिए।
जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठिए—क्योंकि जाति या धर्म नहीं, जब सोच बंटती है तो हिंदुस्तान कमजोर होता है।


