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Friday, September 4, 2026

वीडियो ने दिखाई पूरी फिल्म, पुलिस के प्रेस नोट में ‘शॉर्ट फिल्म

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– वायरल वीडियो में दिखा अलग नजारा
– पुलिस की पटकथा में मामला सिर्फ गाली-गलौज और आपसी मारपीट तक सिमटा
– नौ महीने से इंसाफ की बाट जोह रहे परिवार की फरियाद मुख्यमंत्री तक पहुंचने से पहले ही थम गई
– अब सवाल वीडियो पर नहीं, उसकी व्याख्या पर ज्यादा हैं

शरद कटियार |

कभी-कभी तस्वीरें इतनी साफ होती हैं कि उन्हें किसी सफाई की जरूरत नहीं पड़ती। कैमरा चलता है तो वह वही दिखाता है जो सामने घट रहा होता है। लेकिन जब उसी घटनाक्रम का सरकारी ब्यौरा सामने आता है और उसमें कहानी कुछ छोटी, कुछ अलग और कुछ ज्यादा सुविधाजनक दिखाई देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
फतेहगढ़ पुलिस का जन्माष्टमी के दिन जारी किया गया प्रेस नोट फिलहाल इसी वजह से चर्चा में है। वायरल वीडियो में घटनाक्रम की एक तस्वीर दिखाई दे रही है और पुलिस के प्रेस नोट में उसी घटना की दूसरी तस्वीर। वीडियो में पुलिस की मौजूदगी के बीच महिलाओं के साथ कथित धक्का-मुक्की और एक युवक के साथ मारपीट के दृश्य दिखाई देते हैं, जबकि पुलिस के आधिकारिक बयान में पूरा मामला दो पक्षों के बीच गाली-गलौज और मारपीट तक सीमित नजर आता है।
यानी मामला कुछ ऐसा हो गया है कि वीडियो ने पूरी फिल्म दिखा दी और प्रेस नोट में ‘शॉर्ट फिल्म’ जारी कर दी गई।
मामला उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रुखाबाद के जहानगंज थाना क्षेत्र के कोरीखेड़ा गांव का है। दस वर्षीय आशुतोष की हत्या को करीब नौ महीने बीत चुके हैं। परिवार अब भी इस उम्मीद में है कि घटना का खुलासा होगा, आरोपियों की गिरफ्तारी होगी और एक मां को अपने बेटे के लिए न्याय मिलेगा।
गुरुवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले में आगमन के दौरान परिवार अपनी पीड़ा मुख्यमंत्री तक पहुंचाना चाहता था। आखिर लोकतंत्र में मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचाने की इच्छा कोई अपराध तो नहीं।
लेकिन मुख्यमंत्री तक फरियाद पहुंचने से पहले ही गांव में पुलिस पहुंच गई और उसके बाद जो दृश्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को एक अलग बहस में ला खड़ा किया।
वायरल वीडियो को लेकर जो दृश्य सामने आए हैं, उनमें पुलिस की मौजूदगी साफ दिखाई देती है। महिला के साथ कथित मारपीट और धक्का-मुक्की के आरोप भी इसी वीडियो के आधार पर उठ रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि दोनों पक्षों में विवाद हुआ और स्थिति नियंत्रित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया गया।
अब असली सवाल यही है,जांच किसकी होगी? घटना की या उसकी व्याख्या की?
अगर वीडियो में दिखाई दे रहे दृश्य किसी दूसरे संदर्भ के हैं तो पुलिस को यह संदर्भ भी जनता के सामने रखना चाहिए। यदि वीडियो वास्तविक घटनाक्रम का हिस्सा है तो फिर यह बताना भी जरूरी है कि उसमें दिखाई दे रहे दृश्यों की जांच किस स्तर पर हुई।
क्योंकि आज के दौर में कैमरा किसी का रिश्तेदार नहीं होता। वह न पुलिस का पक्ष लेता है, न पीड़ित का। जो सामने आता है, उसे दर्ज कर देता है।
मृतक की बहन अंशिका गुप्ता ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर परिवार के साथ कथित अभद्रता, मारपीट और आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं। एक अन्य वायरल वीडियो को लेकर थाना प्रभारी पर मृतक की मां के संबंध में बेहद गंभीर टिप्पणी किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और निष्पक्ष जांच जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि नौ महीने पहले अपना दस साल का बच्चा खो चुकी मां अगर आज भी न्याय की तलाश में पुलिस और सरकार के दरवाजे पर खड़ी है, तो उसके साथ संवाद का तरीका कैसा होना चाहिए?
उसे भरोसा मिलना चाहिए या भय?उसे जवाब मिलना चाहिए या आरोप?उसे न्याय की राह दिखाई जानी चाहिए या फिर उसके सवालों को ही विवाद में बदल दिया जाना चाहिए?
‘जीरो टॉलरेंस’ का अर्थ सिर्फ अपराधियों से सख्ती नहीं
उत्तर प्रदेश सरकार महिला सुरक्षा और महिला सशक्तीकरण की बात लगातार करती है। ऐसे में फर्रुखाबाद की यह तस्वीर कई असहज सवाल छोड़ती है।
खासकर तब, जब जिले की पुलिस व्यवस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां महिलाओं के हाथों में हों। मातृशक्ति के नेतृत्व वाली पुलिस व्यवस्था से समाज स्वाभाविक रूप से संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है।
यह मामला किसी पुलिस अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कटघरे में खड़ा करने से ज्यादा उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो एक पीड़ित मां को न्याय का भरोसा देने के लिए बनाई गई है।
यदि वायरल वीडियो में लगाए जा रहे आरोप गलत हैं तो निष्पक्ष जांच कर उन्हें गलत साबित किया जाना चाहिए। और यदि आरोपों में दम है तो कार्रवाई भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए।
क्योंकि ‘जीरो टॉलरेंस’ का असली अर्थ तभी पूरा होगा, जब उसकी कसौटी पुलिस की जवाबदेही पर भी लागू हो।
सबसे बड़ा दुख अभी भी आशुतोष की मां के पास है,
जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का पर्व है। कृष्ण अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और अधर्म के अंत की प्रतीक कथा हैं। उसी दिन एक गरीब परिवार अपने दस साल के बच्चे के लिए न्याय की गुहार लेकर खड़ा था।
विडंबना देखिए,जिस दिन पूरा देश कन्हैया के जन्म का उत्सव मना रहा था, उसी दिन एक मां अपने ‘कन्हैया’ के लिए इंसाफ मांग रही थी, उस प्रदेश में जहां के मुख्यमंत्री बच्चों से सर्वाधिक प्यार करते हैं,उस प्रदेश में जहां कानून व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन फर्रुखाबाद जनपद में कानून के रखवाले पीड़ितों पर अपना कहर बरपा रहे थे । जहां जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान से लेकर थानाध्यक्ष महिला हैं, और खुलेआम महिलाओं पर बर्बरता हो रही है यह कोई नया मामला नहीं इससे पूर्व इसी थाना क्षेत्र में13 साल की मासूम बच्ची संग दुष्कर्म के मामले में भी पुलिस द्वारा एक नहीं सुनी गईं,जब पीड़िता बेटी और उसकी विधवा माँ न्याय के लिये दर-दर भटकने को मजबूर हो गई थी ।
उसे अपने बेटे के हत्यारों के बारे में जवाब चाहिए था। उसे यह जानना था कि नौ महीने बाद भी न्याय की मंजिल इतनी दूर क्यों है। उसे मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचानी थी।
लेकिन कहानी वहां पहुंच गई जहां हत्या के मूल सवाल से ज्यादा चर्चा पुलिस और परिवार के बीच हुए विवाद की होने लगी।
यही सबसे बड़ी चिंता है।
आशुतोष की हत्या का क्या हुआ?जांच कहां पहुंची?
आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?परिवार को मुख्यमंत्री से मिलने क्यों नहीं दिया गया?
वायरल वीडियो की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं?और वीडियो तथा प्रेस नोट में दिखाई दे रहे अंतर का जवाब कौन देगा?इन सवालों का जवाब किसी नए प्रेस नोट से नहीं, निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।क्योंकि जनता को पूरी फिल्म देखने के बाद सिर्फ ‘शॉर्ट फिल्म’ दिखाकर कहानी खत्म नहीं की जा सकती।
उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रुखाबाद की इस घटना में असली जरूरत किसी पक्ष की जीत या हार की नहीं, बल्कि उस मां के भरोसे को बचाने की है,जिसने नौ महीने पहले अपना दस साल का बेटा खोया है और अब न्याय के इंतजार में व्यवस्था की ओर देख रही है, और संघ में निर्दय महिला थाना अध्यक्ष की मार और गालियां भी शाह रही अपने बेटे को पिल्लू से तुलना कराने को विवश है ।

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