उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद विवाह व्यवस्था में प्रस्तावित बदलाव को केवल निकाहनामे में एक पंक्ति बदलने की कवायद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा विषय है कि जब कानून सबके लिए समान है तो उसके पालन की जिम्मेदारी भी सबकी समान होनी चाहिए।
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड की ओर से समान नागरिक संहिता के अनुरूप नया निकाहनामा तैयार किए जाने की बात सामने आई है। प्रस्तावित व्यवस्था में एक समय में केवल एक विवाह का प्रावधान रखा जाएगा। पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त हुए बिना दूसरा निकाह कराने की अनुमति नहीं होगी। इसका सीधा अर्थ है कि विवाह को धार्मिक प्रक्रिया के साथ-साथ अब कानूनी जिम्मेदारी के दायरे में भी स्पष्ट रूप से देखा जाएगा।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं है। इसके साथ पति-पत्नी के अधिकार, बच्चों का भविष्य, संपत्ति, उत्तराधिकार और परिवार की सामाजिक सुरक्षा जैसे अनेक सवाल जुड़े होते हैं। कानून यदि एक विवाह को वैध मानक बनाता है तो उसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि बिना वैध कानूनी तलाक के दूसरा निकाह कराने वाले मौलवी के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो निकाह कराने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। उसे केवल धार्मिक रस्म पूरी कराने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विवाह की कानूनी स्थिति के प्रति सावधान भूमिका निभाने वाला माना जाएगा।
लेकिन यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है।
कानून किताब में लिख देने से समाज नहीं बदलता, कानून को जमीन पर निष्पक्षता से लागू करना पड़ता है।
यदि कोई व्यक्ति नियम तोड़ता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। चाहे वह कितना प्रभावशाली हो, किसी भी समुदाय से आता हो या किसी धार्मिक-सामाजिक संस्था से जुड़ा हो। समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि इसका इस्तेमाल चयनात्मक कार्रवाई के लिए नहीं, बल्कि वास्तव में समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित करने के लिए किया जाए।
उत्तराखंड का प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों को एक समान कानूनी व्यवस्था के तहत लाने की कोशिश की गई है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे महिलाओं के अधिकार मजबूत होंगे और विवाह संबंधी विवादों में कानूनी स्पष्टता आएगी। वहीं आलोचकों की चिंता यह है कि धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों में सरकार को संवेदनशीलता और व्यापक संवाद के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
दोनों पक्षों की बातों के बीच एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—किसी भी महिला को केवल इसलिए असुरक्षित स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता कि उसके पति ने दूसरी शादी करने का फैसला कर लिया।
यदि कानून एक विवाह की व्यवस्था करता है तो पहली पत्नी के अधिकारों की रक्षा भी उसी मजबूती से होनी चाहिए। यही किसी भी आधुनिक नागरिक कानून की वास्तविक परीक्षा है।
लेकिन सरकार और प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कानून लागू करने के नाम पर समाज में अनावश्यक तनाव पैदा न हो। धार्मिक संस्थाओं, निकाह कराने वाले मौलवियों और आम नागरिकों को नियमों की स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। केवल कार्रवाई करने के बजाय जागरूकता, पंजीकरण और कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि असली सुधार तब होगा जब निकाह कराने वाला व्यक्ति स्वयं पूछे,पहले विवाह की कानूनी स्थिति क्या है? तलाक हुआ है या नहीं? विवाह का पंजीकरण हुआ है या नहीं? और दोनों पक्ष कानून के अनुसार विवाह करने के लिए पात्र हैं या नहीं?
यही व्यवस्था कानून को कागज से निकालकर समाज तक पहुंचाएगी।
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के इस प्रयोग का मूल्यांकन भी इसी आधार पर होना चाहिए। न कानून किसी धर्म का दुश्मन बने और न धर्म कानून से ऊपर हो।
एक नागरिक के अधिकार और दूसरे नागरिक के अधिकार में अंतर नहीं होना चाहिए।
और अगर सरकार वास्तव में समान नागरिक संहिता को समानता का कानून मानती है, तो उसे एक बात हर स्तर पर साबित करनी होगी,कानून न हिंदू देखे, न मुस्लिम, कानून केवल नागरिक देखे।यही समानता की असली परीक्षा है।


