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Thursday, September 3, 2026

जयशंकर बोले – तेल खरीद पर रोक से नहीं रुकेगी जंग, बातचीत से ही निकलेगा समाधान

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कीव। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत ने एक बार फिर बातचीत और कूटनीति को ही समाधान का रास्ता बताया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को कीव में कहा कि युद्ध को इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता कि कोई देश रूस से तेल, खनिज, धातु या अन्य वस्तुएं खरीदता है या नहीं। संघर्ष का समाधान बातचीत और समझौते से ही संभव है।

यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ पत्रकारों से बातचीत में जयशंकर ने कहा कि भारत युद्ध समाप्त कराने में मदद के लिए तैयार है। जरूरत पड़ने पर भारत मध्यस्थता की भूमिका निभाने को भी तैयार है। इसके बाद उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की।

यूक्रेन के विदेश मंत्री सिबिहा ने जयशंकर की यात्रा को मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि रूस के लगातार हमलों के बीच भारतीय विदेश मंत्री का कीव पहुंचना अहम संदेश है। दोनों पक्षों ने काला सागर में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी चर्चा की।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब डेढ़ महीने में काला सागर में 300 से अधिक जहाजों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। इनमें अनाज, तेल और अन्य सामान ले जाने वाले जहाज शामिल हैं। लगातार हमलों से समुद्री व्यापार प्रभावित होने और गेहूं-मक्का की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

जयशंकर और सिबिहा के बीच बुनियादी ढांचे, दवा उद्योग, प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। दोनों देश अगली अंतर-सरकारी आयोग की बैठक आयोजित करने पर सहमत हुए।

जयशंकर 3 से 5 सितंबर तक यूक्रेन और पोलैंड की यात्रा पर हैं। यूक्रेन के बाद वह पोलैंड जाएंगे, जहां वहां के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे।

रूस और यूक्रेन के बीच फरवरी 2022 से जारी युद्ध अब पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। रूस यूक्रेन के करीब 20 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण का दावा करता है। दोनों देशों के बीच शांति वार्ता में डोनबास क्षेत्र सबसे बड़ी अड़चनों में शामिल है। रूस इस क्षेत्र पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहता है, जबकि यूक्रेन अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है।

ऐसे समय में जयशंकर का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि प्रतिबंध, तेल खरीद या आर्थिक दबाव के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए ही युद्ध का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

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