शरद कटियार
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी कसौटी उसके बड़े-बड़े फैसले नहीं, बल्कि वह क्षण होता है जब कोई कमजोर और परेशान व्यक्ति अपनी छोटी-सी उम्मीद लेकर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचता है। सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनता दर्शन में ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला, जिसने यह सवाल भी खड़ा किया कि शासन की संवेदनशीलता आखिर कितनी दूर तक और कितनी तेजी से आम आदमी तक पहुंचती है।
अयोध्या से अपनी गंभीर रूप से बीमार बहन को लेकर पहुंचे श्याम सोनकर के लिए लखनऊ आना केवल एक चिकित्सकीय जरूरत नहीं था, बल्कि आर्थिक मजबूरी से जूझते परिवार के सामने खड़ी बड़ी चुनौती भी थी। बहन बबिता को डॉक्टरों ने लखनऊ रेफर कर दिया था, लेकिन इलाज का खर्च परिवार की क्षमता से बाहर था। ऐसे समय में भाई ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी परेशानी रखी।
आमतौर पर जनता दर्शन में शिकायत सुनने के बाद संबंधित विभाग को कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन इस मामले में मुख्यमंत्री ने तत्काल निर्णय लिया। बीमार महिला को मुख्यमंत्री आवास से एंबुलेंस के जरिए डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान भेजा गया और उसका उपचार शुरू कराया गया। यही वह बिंदु है जहां शासन की संवेदनशीलता कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई देती है।
किसी गरीब परिवार के लिए अस्पताल में भर्ती होना और इलाज शुरू होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन उस परिवार की परिस्थितियों में यह किसी बड़ी राहत से कम नहीं। बहन के अस्पताल पहुंचने की खबर मिलने के बाद भाई की आंखों से छलके आंसू इसी राहत की कहानी कहते हैं। यह आंसू केवल भावुकता के नहीं थे, बल्कि उस चिंता के कम होने के थे, जो बीमारी के साथ-साथ पैसों की कमी ने पैदा कर दी थी।
मुख्यमंत्री ने इलाज के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिया। जनता दर्शन में इलाज के लिए सहायता मांगने पहुंचे अन्य लोगों को भी उन्होंने आश्वस्त किया कि पैसे के अभाव में किसी का इलाज नहीं रुकने दिया जाएगा। अधिकारियों को उपचार के अनुमानित खर्च की प्रक्रिया शीघ्र पूरी करने के निर्देश देना भी इसी सोच का हिस्सा है।
यह संदेश महत्वपूर्ण है। बीमारी गरीब और अमीर में अंतर नहीं करती, लेकिन इलाज की व्यवस्था अक्सर आर्थिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग अनुभव देती है। ऐसे में सरकारी सहायता का उद्देश्य यही होना चाहिए कि आर्थिक कमजोरी किसी व्यक्ति के जीवन और इलाज के बीच दीवार न बने।
जनता दर्शन का दूसरा दृश्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। अपनी मां के साथ आई एक मासूम बच्ची से मुख्यमंत्री का सहज संवाद और उसके लिए चॉकलेट मंगाकर अपने हाथों से रैपर खोलना वहां मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आया। गंभीर समस्याओं और शिकायतों से भरे माहौल में कुछ पल के लिए बच्ची की खिलखिलाहट ने वातावरण को बदल दिया।
राजनीति में अक्सर पद, प्रोटोकॉल और सत्ता की भाषा हावी रहती है। ऐसे में किसी बच्चे से सहज होकर बात करना या किसी परेशान परिवार की समस्या को व्यक्तिगत संवेदना के साथ सुनना यह याद दिलाता है कि शासन केवल फाइलों और आदेशों का नाम नहीं है। शासन का मानवीय पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
हालांकि जनता दर्शन की वास्तविक सफलता किसी एक मामले में तत्काल राहत तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि मुख्यमंत्री के स्तर से दिए गए निर्देश संबंधित विभागों तक उसी तत्परता से पहुंचें और उनका पालन भी सुनिश्चित हो। किसी पीड़ित को मुख्यमंत्री तक पहुंचने की जरूरत ही न पड़े, यदि स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्था उसकी समस्या समय रहते समझकर समाधान कर दे,आदर्श व्यवस्था की दिशा यही होनी चाहिए।
फिर भी अयोध्या के इस परिवार की कहानी एक सकारात्मक संदेश जरूर देती है। सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब किसी असहाय की पीड़ा को केवल शिकायत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखता है, तब जनता और शासन के बीच भरोसे की डोर मजबूत होती है।
जनता दर्शन की असली सार्थकता भी शायद यही है,जहां फरियाद केवल सुनी न जाए, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसी क्षण राहत में बदल जाए।
जनता दर्शन में दिखी सत्ता की संवेदना, एक भाई की गुहार ने बदल दी पूरी तस्वीर


