– गंगाचरण के मोर्चे से बढ़ी हलचल
– आरक्षण मामले पर उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के वयान के बाद मचा सियासी बवाल
– पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत मैदान में उतरे
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर बारूद की तरह सुलग उठा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आरक्षण सुधार की आवाज जब लखनऊ पहुंची और उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का भरोसा दिया, तो सियासी गलियारों में सवालों का तूफान खड़ा हो गया।
मामला यहीं नहीं रुका। आरक्षण को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर और बाहर अलग-अलग सुर सामने आने लगे हैं। एक ओर आरक्षण विरोधी आंदोलनकारी मौजूदा व्यवस्था में बदलाव और जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा की मांग को लेकर मुखर हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे सामाजिक न्याय के अधिकार पर हमला बताते हुए सरकार से अपना रुख साफ करने की मांग कर रहा है। अखिलेश यादव ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आरक्षण था, है और रहेगा, जबकि मायावती ने भी भाजपा सरकार से आरक्षण के सवाल पर स्पष्ट स्थिति बताने की मांग की है।
अब गंगाचरण राजपूत के मैदान में उतरने की चर्चा
इसी बीच पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत का नाम सामने आने से बुंदेलखंड से लेकर लखनऊ तक राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। ओबीसी राजनीति में अपनी पहचान रखने वाले राजपूत पहले भी जनता के मुद्दों पर बेबाकी से बोलते रहे हैं। हाल के महीनों में वह अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग को लेकर लगातार सक्रिय हैं और ‘राज्य दो-वोट लो’ जैसे नारे के साथ राजनीतिक माहौल गरमाते रहे हैं।
ऐसे में यदि आरक्षण के सवाल पर भी वह खुलकर मोर्चा खोलते हैं तो यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनावी मौसम में सामाजिक समीकरणों को प्रभावित करने वाला बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा सकता है।
आरक्षण के मुद्दे पर सोशल मीडिया पहले ही दो खेमों में बंटता दिखाई दे रहा है। एक तरफ ‘मेरिट और समान अवसर’ के नाम पर मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ इसे पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों के संवैधानिक अधिकार से जोड़कर बचाने की मुहिम तेज हो रही है। हाल के दिनों में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों और उनसे जुड़े वीडियो तथा राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने सोशल मीडिया पर बहस को और तीखा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच आरक्षण का मुद्दा जिस तेजी से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लौट रहा है, उसने सभी दलों की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा के सामने जहां आरक्षण समर्थक सामाजिक आधार को साधने की चुनौती है, वहीं आरक्षण में बदलाव की मांग कर रहे वर्गों की नाराजगी को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा।
यही वजह है कि बृजेश पाठक की आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों से मुलाकात को विपक्ष राजनीतिक मुद्दा बना रहा है और अब हर निगाह इस बात पर है कि भाजपा नेतृत्व आरक्षण के सवाल पर आखिर स्पष्ट रूप से क्या रुख अपनाता है।
फिलहाल आरक्षण की चिंगारी सियासी आग का रूप ले चुकी है
आरक्षण पर महासंग्राम! पाठक के रुख से गरमाई सियासत, गंगाचरण के मोर्चे से बढ़ी हलचल


