मुजफ्फरनगर। त्वरित न्यायालय संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के लगातार सख्त फैसले इन दिनों चर्चा में हैं। करीब आठ महीने के कार्यकाल में अदालत ने नौ जघन्य हत्याकांडों में कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। हालांकि यह स्पष्ट रहना जरूरी है कि सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा स्वतः अंतिम नहीं होती; इसके लिए उच्च न्यायालय की पुष्टि और आगे की न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक होती है।
रवि कुमार दिवाकर ने नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर की त्वरित न्यायालय संख्या-3 में कार्यभार संभाला था। इसके बाद उन्होंने लंबे समय से लंबित गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई तेज की। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच आए फैसलों में कई पुराने और जघन्य हत्याकांड शामिल रहे।
6 अप्रैल 2026 को समीर सैफी हत्याकांड में तीन दोषियों,सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज—को मृत्युदंड सुनाया गया। यह मामला वर्ष 2019 में लेन-देन के विवाद से जुड़ी हत्या का था। इसके बाद 28 अप्रैल को शेखर हत्याकांड में चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया।
30 मई को राजेश देवी और उनके छह वर्षीय बेटे हिमांशु की हत्या के मामले में रईस उर्फ रहीस को फांसी की सजा सुनाई गई। 20 जून को राजेंद्र सैनी हत्याकांड में रामकरण उर्फ सावन गिरी और गजेंद्र उर्फ गीलू को मृत्युदंड मिला।
इसके बाद 2 जुलाई को होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में दीपक को मृत्युदंड सुनाया गया। 17 जुलाई को शामली के कुड़ाना गांव के राज सिंह हत्याकांड में चार दोषियों को फांसी की सजा दी गई।
12 अगस्त को छपार क्षेत्र के तेजलहेड़ा में लकड़ी ठेकेदार सालिम की हत्या के मामले में शाहनवाज को मृत्युदंड सुनाया गया। इसके ठीक अगले दिन, 13 अगस्त को शामली के भभीसा गांव में 2014 में हुए पवन हत्याकांड में चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। इसी फैसले के साथ मुजफ्फरनगर में इस अवधि के दौरान मृत्युदंड पाने वाले दोषियों की संख्या 22 तक पहुंच गई।
इन फैसलों की एक महत्वपूर्ण कड़ी यह भी है कि कई मामले वर्षों से लंबित थे। अदालत द्वारा लगातार सुनवाई और निर्णय दिए जाने से पुराने गंभीर मामलों में पीड़ित परिवारों को लंबे इंतजार के बाद न्यायिक फैसला मिला है। न्यायाधीश दिवाकर के मुजफ्फरनगर कार्यकाल में पुराने मामलों के तेजी से निस्तारण ने भी न्यायिक क्षेत्र का ध्यान आकर्षित किया है।
हालांकि मृत्युदंड को लेकर कानूनी प्रक्रिया बेहद गंभीर और बहुस्तरीय है। निचली अदालत का फैसला अंतिम नहीं होता और ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है। इसके बाद अपील तथा अन्य संवैधानिक उपचारों की प्रक्रिया भी उपलब्ध रहती है। इसलिए इन 22 मामलों को अंतिम रूप से फांसी दिए जाने के बजाय अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
रवि कुमार दिवाकर इससे पहले वाराणसी के ज्ञानवापी मामले में अपने न्यायिक आदेशों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ चुके हैं। अब मुजफ्फरनगर में लगातार गंभीर आपराधिक मामलों में आए फैसलों ने उन्हें फिर सुर्खियों में ला दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उनकी करीब 17 वर्ष की न्यायिक सेवा में अब तक 35 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया जा चुका है, जिनमें मुजफ्फरनगर में दिए गए 22 फैसले शामिल हैं।


