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Wednesday, August 12, 2026

रूस की तरफ से मध्यस्थ बनेंगे पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़

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यूक्रेन के सरकारी बैंक से संपत्ति विवाद में मिली अहम जिम्मेदारी

नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस ने यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में अपना मध्यस्थ नियुक्त किया है। विवाद 1998 में रूस और यूक्रेन के बीच हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत चल रहा है।

ओश्चादबैंक का आरोप है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस के कब्जे वाले दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में उसकी बैंक शाखाओं, एटीएम, कार्यालयों, जमीन और अन्य संपत्तियों पर उसका नियंत्रण खत्म हो गया। बैंक ने इससे हुए नुकसान के लिए कई सौ मिलियन डॉलर का दावा किया है।

इस मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण करेगा। रूस की ओर से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ मध्यस्थ होंगे, जबकि ओश्चादबैंक की ओर से ग्रीस के अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ स्टावरोस ब्रेकूलाकिस को नियुक्त किया गया है। दोनों पक्षों की सहमति से कोस्टारिका की पूर्व व्यापार मंत्री डायला जिमेनेज को न्यायाधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है।

ओश्चादबैंक ने जुलाई 2025 में रूस को विवाद का नोटिस भेजा था। जवाब नहीं मिलने पर बैंक ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की। बैंक का कहना है कि युद्ध के कारण उसकी संपत्तियों और कारोबार को भारी नुकसान हुआ।

पहले दो प्रस्ताव ठुकरा चुके हैं चंद्रचूड़: रिपोर्ट के मुताबिक, रूस इससे पहले भी दो अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में डीवाई चंद्रचूड़ को अपना मध्यस्थ बनाने का प्रस्ताव दे चुका था। इनमें जर्मनी की ऊर्जा कंपनी विंटरशाल डीया और यूक्रेन की सरकारी बिजली कंपनी उक्रएनरगो से जुड़े मामले शामिल थे, लेकिन चंद्रचूड़ ने दोनों प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए थे।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में विवाद से जुड़े दोनों पक्ष अपनी ओर से विशेषज्ञ मध्यस्थ नियुक्त करते हैं। ये मध्यस्थ दोनों पक्षों के दावों और साक्ष्यों को सुनकर विवाद पर निर्णय देते हैं। यह प्रक्रिया सामान्य अदालत से अलग होती है और निवेश से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विवादों में इसका व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।

भारत से जुड़े केयर्न एनर्जी और वोडाफोन के मामलों में भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के फैसले महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों विवादों में भारत की पुरानी कर व्यवस्था को लेकर विदेशी कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का रुख किया था।

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