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Wednesday, July 29, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी पर कहा- दबाव असहनीय नहीं होना चाहिए

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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा है कि निर्वाचन आयोग को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की चुनाव संबंधी कार्यों में ड्यूटी लगाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। हालांकि आयोग की यह भी जिम्मेदारी है कि ऐसी तैनाती के कारण शिक्षकों पर असहनीय मानसिक और शारीरिक दबाव न पड़े। चीफ जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय (Devendra Kumar Upadhyaya) और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को बड़े पैमाने पर बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) और गणना कर्मी के रूप में तैनात किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जा चुका है और हाई कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। आयोग ने कहा कि किसी भी शिक्षक से स्कूल के शिक्षण समय के दौरान चुनाव संबंधी कार्य नहीं कराया जा रहा है। बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई शिक्षक प्रतिदिन 6 से 8 घंटे तक स्कूल में पढ़ाने के बाद चुनावी ड्यूटी भी निभाता है, तो इससे उस पर मानसिक और शारीरिक दबाव पड़ सकता है।

अदालत ने कहा कि शिक्षकों की नियमित शैक्षणिक जिम्मेदारियों और चुनावी कार्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि चुनाव संबंधी कार्यों के कारण शिक्षकों पर इतना अधिक बोझ न पड़े कि वह असहनीय हो जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए शिक्षकों के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और शैक्षणिक दायित्वों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

आयोग ने अदालत को बताया कि शिक्षकों से स्कूल समय के दौरान नहीं, बल्कि स्कूल की छुट्टी के बाद बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) का काम कराया जाता है। निर्वाचन आयोग की ओर से कहा गया कि शिक्षकों की नियमित पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए अभियान में स्वयंसेवकों की भी तैनाती की गई है। आयोग ने दावा किया कि हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जा रहा है और शिक्षण कार्य को प्राथमिकता दी जा रही है।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने आयोग के दावों का विरोध करते हुए उन्हें तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। उनका कहना था कि जनहित याचिका दायर होने के बाद ही करीब 10 हजार शिक्षकों को दोबारा स्कूलों में लौटाने के आदेश जारी किए गए। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह कदम इस बात का संकेत है कि पहले शिक्षकों की तैनाती को लेकर गंभीर समस्याएं थीं और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा था।

याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि शिक्षकों को स्कूलों के प्रधानाचार्यों और चुनाव अधिकारियों की ओर से अलग-अलग निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और उन्हें यह समझने में कठिनाई हो रही है कि किस आदेश का पालन किया जाए। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि निर्वाचन आयोग को शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी लगाने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि चुनाव संबंधी कार्यों के कारण उन पर असहनीय मानसिक और शारीरिक दबाव न पड़े।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLO) और स्वयंसेवकों की संख्या का विस्तृत ब्योरा रिकॉर्ड पर रखा है। ऐसे में आयोग के दावों को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता को प्रमाण सहित जवाब दाखिल करना होगा। अदालत ने पूछा कि यदि शिक्षकों से केवल स्कूल समय समाप्त होने के बाद चुनावी कार्य कराया जा रहा है, तो फिर प्रधानाचार्यों को यह निर्देश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि चुनावी ड्यूटी के कारण शिक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए।

जब आयोग की ओर से बताया गया कि शिक्षकों को स्कूल के बाद लगभग पांच घंटे तक बूथ स्तरीय अधिकारी का कार्य करना पड़ सकता है, तो अदालत ने इस पर चिंता जताई। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो शिक्षक पहले ही छह से आठ घंटे तक स्कूल में पढ़ा चुके हों, उनसे कुल 11 घंटे तक काम लेना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने विशेष रूप से महिला शिक्षकों की स्थिति का भी उल्लेख किया और कहा कि कई शिक्षकों पर पारिवारिक जिम्मेदारियां भी होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीठ ने दोहराया कि निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनावी कार्यों के कारण शिक्षकों पर मानसिक और शारीरिक बोझ असहनीय स्तर तक न पहुंचे।

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