– भरत चतुर्वेदी
देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने करोड़ों युवाओं का विश्वास हिला दिया है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा सहित कई राज्यों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के बाद लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। वर्षों की मेहनत पर पानी फिरा, सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के उद्देश्य से सरकार ने पेपर लीक रोकथाम संबंधी विधेयक को लागू करने की दिशा में पहल की है।
इस कानून का मूल उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना है। इसके तहत प्रश्नपत्र लीक करने, परीक्षा में संगठित नकल कराने, डिजिटल माध्यम से पेपर बेचने, सॉल्वर गैंग चलाने और परीक्षा प्रक्रिया में धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। दोषी पाए जाने पर लंबी अवधि की जेल, भारी आर्थिक दंड और संगठित अपराध में शामिल गिरोहों पर कठोर कार्रवाई की व्यवस्था की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून केवल छोटे स्तर के आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में पेपर माफिया, कोचिंग नेटवर्क, तकनीकी सहयोगी और ऐसे अधिकारी या कर्मचारी भी आ सकते हैं जो प्रश्नपत्र लीक कराने में किसी भी रूप में शामिल पाए जाते हैं। इससे परीक्षा माफिया के पूरे नेटवर्क पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है।
हालांकि, केवल कड़ा कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि कई मामलों में कार्रवाई तो हुई, लेकिन मुकदमे वर्षों तक लंबित रहे और दोषियों को समय पर सजा नहीं मिल सकी। यदि जांच में देरी होगी, आरोपियों पर शीघ्र अभियोजन नहीं चलेगा और तकनीकी सुरक्षा मजबूत नहीं होगी, तो कानून का अपेक्षित प्रभाव सीमित रह सकता है।
आज अधिकांश परीक्षाएं डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन डेटा ट्रांसफर और आधुनिक तकनीक पर आधारित हैं। ऐसे में प्रश्नपत्रों की एन्क्रिप्टेड सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी, साइबर ऑडिट और संवेदनशील अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कठोर दंड का प्रावधान।
पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान उन युवाओं को होता है जो वर्षों तक कठिन परिश्रम कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। जब परीक्षा रद्द होती है, तो केवल समय और धन की हानि नहीं होती, बल्कि युवाओं का मनोबल भी टूटता है। कई अभ्यर्थी आयु सीमा पार कर जाते हैं और उन्हें दोबारा अवसर भी नहीं मिल पाता। इसलिए परीक्षा की निष्पक्षता केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर का भी प्रश्न है।
सरकार के लिए यह आवश्यक होगा कि कानून के साथ-साथ परीक्षा संस्थाओं की क्षमता बढ़ाई जाए, आधुनिक तकनीक अपनाई जाए और भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। यदि ऐसा होता है, तो यह विधेयक युवाओं का विश्वास लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पेपर लीक रोकथाम विधेयक तभी सफल माना जाएगा जब किसी परीक्षा को दोबारा कराने की नौबत न आए, दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड मिले तथा हर अभ्यर्थी को यह भरोसा हो कि उसकी सफलता केवल उसकी मेहनत से तय होगी, किसी माफिया की साजिश से नहीं।


