नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस ) की धारा 38 की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिलने का अधिकार है, लेकिन पूछताछ के पूरे समय वकील की लगातार शारीरिक मौजूदगी का कानूनी अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “वकील से मिलने का अधिकार” और “पूछताछ के दौरान वकील की लगातार मौजूदगी का अधिकार” दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 38 का उद्देश्य आरोपी को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है, न कि पुलिस पूछताछ की प्रक्रिया में हर समय वकील की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करना।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस पूछताछ के प्रत्येक सत्र में वकील की मौजूदगी की मांग नहीं की जा सकती। ऐसी शर्तें जांच एजेंसियों की प्रभावी और निष्पक्ष जांच में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए अदालतें पुलिस रिमांड देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगा सकतीं जो जांच प्रक्रिया को अव्यावहारिक बना दें।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि गिरफ्तार व्यक्ति के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं। आरोपी को अपने वकील से मिलने और कानूनी सलाह लेने का अधिकार बना रहेगा तथा जांच एजेंसियों को कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही पूछताछ करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पुलिस जांच और आरोपी के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। इससे बीएनएनएस की धारा 38 के दायरे को लेकर बनी कानूनी अस्पष्टता भी काफी हद तक समाप्त हो गई है।
पूछताछ में हर समय वकील की मौजूदगी जरूरी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 38 की व्याख्या की


