भरत चतुर्वेदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान रही है कठिन परिस्थितियों में भी अपने फैसलों पर दृढ़ रहना। पिछले एक दशक में कई बड़े आंदोलन हुए, लेकिन सरकार ने अधिकांश मामलों में अपने रुख को तुरंत नहीं बदला।
शाहीन बाग आंदोलन महीनों चला, लेकिन नागरिकता संशोधन कानून वापस नहीं लिया गया। किसान आंदोलन एक वर्ष से अधिक चला, उसके बाद तीन कृषि कानून वापस लिए गए। लद्दाख में सोनम वांगचुक ने लंबे समय तक आंदोलन और अनशन किए, लेकिन उनकी सभी प्रमुख मांगें तत्काल स्वीकार नहीं हुईं। नई संसद के उद्घाटन के समय देश के शीर्ष पहलवान धरने पर बैठे रहे, फिर भी सरकार अपने कार्यक्रम पर कायम रही।
इसी पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन एक नया सवाल खड़ा करता है। यदि इस आंदोलन के बाद सरकार की ओर से महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लिए गए, तो उसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
भारत दुनिया का सबसे युवा देशों में से एक है। विभिन्न जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार देश में लगभग 37 करोड़ जेनरेशन Z के युवा हैं और 35 वर्ष से कम आयु की आबादी लगभग 65% है। यह वर्ग आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा मतदाता समूह बनने जा रहा है। छात्र आंदोलन ने यह संकेत दिया कि यदि यह वर्ग किसी मुद्दे पर संगठित हो जाए, तो उसका राजनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है।
पहले आंदोलन शहरों तक सीमित रहते थे, लेकिन इस बार बड़ी लड़ाई सोशल मीडिया पर भी लड़ी गई। इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाखों पोस्ट, वीडियो और चर्चाओं ने इस मुद्दे को लगातार राष्ट्रीय विमर्श में बनाए रखा।
डिजिटल युग में सरकारें केवल धरनास्थल नहीं, बल्कि ऑनलाइन जनमत को भी नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।
रोजगार और शिक्षा ऐसे विषय हैं जिनसे लगभग हर परिवार जुड़ा होता है। किसी छात्र आंदोलन का असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अभिभावकों और समाज के बड़े हिस्से तक पहुंचता है। इसलिए ऐसे मुद्दों का राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है।
राजनीति में कई बार सरकारें किसी विवाद को लंबा खींचने के बजाय ऐसा फैसला लेती हैं जिससे तनाव कम हो और प्रशासन आगे बढ़ सके। किसी मंत्री का इस्तीफा हमेशा व्यक्तिगत जिम्मेदारी का संकेत हो, यह जरूरी नहीं; कई बार इसे व्यापक राजनीतिक प्रबंधन की रणनीति भी माना जाता है।
यदि कोई आंदोलन लंबा चलता है तो विपक्ष को सरकार पर लगातार हमला करने का अवसर मिलता है। ऐसे में सरकारें कभी-कभी विवाद को सीमित करने के लिए राजनीतिक फैसले लेती हैं। यह भी एक संभावित कारण हो सकता है।
सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से यह नहीं कहा गया है कि किसी आंदोलन के दबाव में निर्णय लिए गए। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि “सरकार झुक गई”, तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस घटनाक्रम ने यह दिखाया कि युवा मतदाता, सोशल मीडिया का जनमत और शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे आज भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली कारकों में शामिल हो चुके हैं।
जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था। इसने यह संदेश दिया कि भारत की नई पीढ़ी अब राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। चाहे सरकार का फैसला रणनीतिक रहा हो, राजनीतिक प्रबंधन का हिस्सा रहा हो या स्वतंत्र प्रशासनिक निर्णय,इस घटनाक्रम ने एक बात स्पष्ट कर दी कि जेनरेशन जे को अब अनदेखा करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा।
आने वाले चुनावों में यह पीढ़ी केवल वोटर नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने वाली सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है।


