अश्वनी वर्मा
भारत तेजी से बदल रहा है। तकनीक, शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों के जीवन को पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बनाया है। लेकिन इन सुविधाओं के साथ एक ऐसी समस्या भी तेजी से बढ़ी है, जिस पर समाज आज भी खुलकर बात करने से कतराता है—मानसिक तनाव। यह एक ऐसा संकट है जो दिखाई नहीं देता, लेकिन लाखों लोगों के जीवन, परिवार और भविष्य को भीतर ही भीतर प्रभावित कर रहा है।
एक समय था जब मानसिक तनाव को केवल कुछ विशेष परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन आज यह समस्या हर आयु वर्ग तक पहुंच चुकी है। विद्यालय में पढ़ने वाला छात्र परीक्षा और प्रतियोगिता के दबाव में है, कॉलेज का युवा करियर और नौकरी की चिंता में है, नौकरीपेशा व्यक्ति लक्ष्य और प्रदर्शन के बोझ से जूझ रहा है, व्यापारी आर्थिक अनिश्चितताओं से परेशान है और बुजुर्ग अकेलेपन तथा उपेक्षा के कारण मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं। यानी तनाव अब किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा।
आज की जीवनशैली में सबसे बड़ा बदलाव तुलना की संस्कृति है। सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता, महंगी जीवनशैली और दिखावटी खुशियों को देखकर अनेक लोग अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। लोग यह भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली तस्वीरें अक्सर जीवन का केवल एक चमकदार हिस्सा होती हैं, पूरी सच्चाई नहीं। यही तुलना धीरे-धीरे हीन भावना, चिंता और अवसाद का कारण बन जाती है।
प्रतिस्पर्धा भी पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। बेहतर अंक, अच्छी नौकरी, ऊंचा वेतन, बड़ा घर और सामाजिक प्रतिष्ठा पाने की दौड़ में लोग स्वयं को लगातार साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। इस दौड़ में आराम, परिवार, मित्रता और मानसिक शांति पीछे छूटती जा रही है। परिणामस्वरूप अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में आज भी कई भ्रांतियां हैं। बहुत से लोग तनाव या अवसाद को कमजोरी मानते हैं। कई परिवार इस विषय पर बात करने से बचते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक बदनामी का डर होता है। यही चुप्पी समस्या को और गंभीर बना देती है। जिस प्रकार बुखार या हृदय रोग का इलाज डॉक्टर से कराया जाता है, उसी प्रकार मानसिक तनाव या अवसाद की स्थिति में मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की सलाह लेना भी पूरी तरह सामान्य और आवश्यक है।
परिवार इस समस्या के समाधान की पहली और सबसे मजबूत कड़ी है। माता-पिता को बच्चों से केवल पढ़ाई और करियर की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनकी भावनाओं, मित्रों, परेशानियों और सपनों को भी समझना चाहिए। कई बार केवल ध्यान से सुनी गई एक बात किसी व्यक्ति को गहरे मानसिक संकट से बाहर निकाल सकती है। परिवार में संवाद, विश्वास और अपनापन तनाव कम करने की सबसे प्रभावी दवा है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। केवल परीक्षा और परिणाम पर ध्यान देने के बजाय विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियमित परामर्श, योग, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। प्रत्येक शिक्षण संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर की उपलब्धता समय की मांग बन चुकी है।
कार्यस्थलों पर भी कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। अत्यधिक कार्यभार, असुरक्षित रोजगार, लगातार प्रदर्शन का दबाव और कार्य-जीवन संतुलन की कमी मानसिक तनाव को बढ़ाते हैं। संस्थानों को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहां कर्मचारी बिना डर अपनी समस्याएं साझा कर सकें।
सरकार और समाज को मिलकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, विशेषज्ञों की उपलब्धता, हेल्पलाइन, परामर्श केंद्र और जनजागरूकता अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मीडिया को भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखे। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन, परिवार और मित्रों के साथ समय बिताना, योग, ध्यान, पुस्तक पढ़ना और डिजिटल उपकरणों का संतुलित उपयोग तनाव कम करने में सहायक हो सकते हैं। सफलता की दौड़ में अपने मन की शांति खो देना किसी भी उपलब्धि से अधिक बड़ी हानि है।
मानसिक स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। जिस समाज में लोग खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकें, सहायता मांगने में संकोच न करें और एक-दूसरे का सहारा बनें, वही समाज वास्तव में मजबूत और संवेदनशील कहलाएगा। स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मन भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि मजबूत राष्ट्र की नींव केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ नागरिकों से तैयार होती है।


