
प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल क्रांति, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, अंतरिक्ष उपलब्धियां और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव देश की नई पहचान बन चुके हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ कुछ ऐसे समकालीन मुद्दे भी हैं जो सरकार, राजनीतिक दलों और समाज तीनों से गंभीर चिंतन की मांग करते हैं।
हाल के दिनों में कई घटनाएं राष्ट्रीय बहस का विषय बनी हैं। कहीं शिक्षा और विश्वविद्यालयों को लेकर विवाद हैं, कहीं धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, तो कहीं जनप्रतिनिधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में जनता का विश्वास कैसे मजबूत रखा जाए।
देश में पारदर्शिता की मांग लगातार बढ़ रही है। चाहे सरकारी योजनाएं हों, सार्वजनिक संस्थान हों या धार्मिक ट्रस्ट हर जगह जवाबदेही की अपेक्षा पहले से अधिक है। सूचना का अधिकार, डिजिटल रिकॉर्ड और सोशल मीडिया के दौर में जनता केवल दावे नहीं, बल्कि प्रमाण भी चाहती है। इसलिए हर संस्था के लिए पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन सकती है।
दूसरा बड़ा मुद्दा रोजगार है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विभिन्न विभागों में भर्तियां निकल रही हैं, लेकिन युवाओं की अपेक्षाएं इससे कहीं अधिक हैं। देश की सबसे बड़ी आबादी युवा है और उनकी ऊर्जा का सही उपयोग तभी होगा जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित हो।
अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का असर भी अब सीधे भारत पर दिखाई देता है। पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और युद्ध जैसे हालात का प्रभाव कन्नौज के इत्र उद्योग से लेकर पेट्रोलियम, निर्यात और निवेश तक महसूस किया जा रहा है। यह बताता है कि आज भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ चुकी है।
जलवायु परिवर्तन भी एक गंभीर चुनौती है। कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़ है, तो कहीं सूखे जैसी स्थिति। शहरों में जलभराव और ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों को नुकसान विकास की योजनाओं के साथ बेहतर आपदा प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
लोकतंत्र की असली ताकत संवाद में है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जनता की समस्याओं को सुने और समयबद्ध समाधान दे, जबकि विपक्ष का दायित्व है कि वह रचनात्मक आलोचना और ठोस सुझावों के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करे। वहीं नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। तथ्य आधारित चर्चा, सामाजिक सद्भाव और कानून के प्रति सम्मान लोकतंत्र को सशक्त बनाते हैं।
भारत आज अवसरों के स्वर्णिम दौर में खड़ा है। यदि विकास, पारदर्शिता, रोजगार, सामाजिक सद्भाव और सुशासन को समान महत्व दिया जाए, तो देश केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी वैश्विक उदाहरण बन सकता है। यही समय की सबसे बड़ी मांग है।
लेखक पूर्व पीएम चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


