नई दिल्ली। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सख्त रुख अपनाते हुए देशभर की अदालतों और पुलिस तंत्र के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यौन अपराधों की जांच और सुनवाई के दौरान पीड़ितों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा तैयार न्यायिक संवेदनशीलता रिपोर्ट और यौन अपराध हैंडबुक का पालन सुनिश्चित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट की वेबसाइटों पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि न्यायाधीश और न्यायिक अधिकारी इसका अध्ययन कर सकें। साथ ही सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज करते समय और आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल करते समय यौन अपराध हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब पटना हाई कोर्ट के एक फैसले का सुप्रीम कोर्ट में उल्लेख किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत को बताया कि पटना हाई कोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को एक मामले में कहा था कि महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और स्थापित कानूनी सिद्धांतों का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे संबंधित कानून और सर्वोच्च अदालत के पूर्व निर्णयों का अध्ययन करें।
विवादित मामला वर्ष 2008 का है, जिसमें एक फोटोग्राफी स्टूडियो के मालिक पर युवती के साथ यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया था, लेकिन पटना हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की दलीलों को आधार बनाते हुए इस आरोप को निरस्त कर भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध माना।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में कानून की व्याख्या करते समय पीड़िता के अधिकारों, गरिमा और परिस्थितियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को देशभर में यौन अपराधों की जांच और सुनवाई की प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


