38.1 C
Lucknow
Sunday, July 12, 2026

“वरदान माँगूँगा नहीं” आत्मसम्मान, संघर्ष और पुरुषार्थ का घोष

Must read

यूथ इंडिया
“वरदान माँगूँगा नहीं”—यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के आत्मविश्वास का सबसे ऊँचा शिखर है। यह उस व्यक्ति की घोषणा है जो अपने भाग्य को किसी चमत्कार, कृपा या संयोग के भरोसे नहीं छोड़ता, बल्कि अपने श्रम, साहस और संकल्प से भविष्य गढ़ने का विश्वास रखता है। यह विचार हमें सिखाता है कि जीवन में जो कुछ भी प्राप्त करना है, वह अपने पुरुषार्थ से प्राप्त करना है, किसी दया या वरदान से नहीं।

आज का समाज तेज़ सफलता का समाज बन गया है। हर कोई मंज़िल चाहता है, लेकिन रास्ते की कठिनाइयों से बचना चाहता है। लोग चाहते हैं कि बिना संघर्ष के सम्मान मिल जाए, बिना तपस्या के उपलब्धियाँ मिल जाएँ और बिना असफलताओं के सफलता मिल जाए। लेकिन प्रकृति का नियम है कि जो वृक्ष जितना ऊँचा होता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं। जीवन भी ऐसा ही है। जितना बड़ा लक्ष्य होगा, उतनी ही बड़ी परीक्षा होगी।

इतिहास गवाह है कि इस देश की महान विभूतियों ने कभी वरदान नहीं माँगे। उन्होंने परिस्थितियों से संघर्ष किया, कठिनाइयों को स्वीकार किया और अपने कर्मों से इतिहास रचा। भगवान राम ने वनवास स्वीकार किया, श्रीकृष्ण ने संघर्षों के बीच धर्म की स्थापना की, महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्य को चुनौती दी, डॉ. भीमराव आंबेडकर ने विपरीत परिस्थितियों में शिक्षा और संविधान के माध्यम से नई दिशा दी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने साधारण परिवार से उठकर देश के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया। इन सबकी सफलता किसी वरदान का परिणाम नहीं थी, बल्कि अथक परिश्रम और अटूट विश्वास का प्रतिफल थी।

जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं जब लगता है कि अब आगे बढ़ना कठिन है। अपने साथ छोड़ देते हैं, विश्वास टूट जाता है, मेहनत का फल नहीं मिलता और रास्ते बंद दिखाई देते हैं। ऐसे समय में अधिकांश लोग भाग्य को दोष देते हैं या किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने लगते हैं। लेकिन जो व्यक्ति अपने भीतर के साहस को जगाए रखता है, वही अंततः विजय प्राप्त करता है। कठिन समय हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत बनाने के लिए आता है।

पत्रकारिता भी इसी सिद्धांत पर चलती है। यदि पत्रकार सत्य लिखना चाहता है, तो उसे दबाव, आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यदि वह हर कठिनाई के समय किसी वरदान की प्रतीक्षा करेगा, तो सत्य कभी सामने नहीं आ पाएगा। पत्रकार का सबसे बड़ा बल उसका चरित्र, उसकी निष्पक्षता और उसका साहस होता है। यही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है।
आज के युवाओं के सामने भी यही सबसे बड़ी चुनौती है। सोशल मीडिया ने सफलता की चमक तो दिखा दी है, लेकिन उसके पीछे की तपस्या को अक्सर छिपा दिया है। लोग परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं। जबकि वास्तविक सफलता उसी को मिलती है जो असफलताओं से सीखता है, गिरकर उठता है और फिर आगे बढ़ता है।
“वरदान माँगूँगा नहीं” का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य ईश्वर में विश्वास न करे। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर से केवल शक्ति माँगी जाए, सफलता नहीं; साहस माँगा जाए, सुविधा नहीं; सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा माँगी जाए, मंज़िल नहीं। मंज़िल तक पहुँचना मनुष्य के कर्म का दायित्व है।
जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि “मैं वरदान नहीं माँगूँगा”, तब वह अपने भीतर छिपी हुई असीम शक्ति को पहचान लेता है। वह जान जाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, यदि इरादे मजबूत हैं तो कोई भी बाधा स्थायी नहीं होती। हार केवल उसी की होती है जो प्रयास करना छोड़ देता है।
आज आवश्यकता इस सोच को अपनाने की है। अपने बच्चों को भी यह सिखाने की है कि जीवन में शॉर्टकट नहीं, बल्कि मेहनत का रास्ता चुनें। समाज को भी ऐसे लोगों का सम्मान करना चाहिए जो अपने कर्म से आगे बढ़ते हैं, न कि केवल भाग्य के भरोसे जीते हैं।
अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा वरदान उसका पुरुषार्थ है। उसके हाथ, उसका मस्तिष्क, उसकी ईमानदारी, उसका साहस और उसका चरित्र ही उसकी वास्तविक संपत्ति हैं। यदि ये उसके साथ हैं, तो उसे किसी अतिरिक्त वरदान की आवश्यकता नहीं।
आइए, हम भी यह संकल्प लें,
वरदान माँगूँगा नहीं,
परिश्रम से अपना भाग्य लिखूँगा।
सुविधाओं की प्रतीक्षा नहीं करूँगा,
संघर्षों से रास्ता बनाऊँगा।
झुककर याचना नहीं,
सीना तानकर कर्म करूँगा।
क्योंकि इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है,
जो अपने भाग्य के निर्माता स्वयं बनते हैं।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article