शरद कटियार
भारत के अपराध जगत में पिछले एक दशक के दौरान यदि किसी नाम ने सबसे अधिक सुर्खियां बटोरी हैं तो वह है लॉरेंस बिश्नोई। कभी एक छात्र राजनीति से जुड़े युवक के रूप में पहचान बनाने वाला यह व्यक्ति आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संगठित अपराध नेटवर्क का चेहरा माना जाता है। जेल में रहते हुए भी उसके नाम से रंगदारी, हत्या, धमकी, हथियारों की तस्करी और अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट चलने के आरोप लगते रहे हैं। यही कारण है कि अब उसके नेटवर्क के खिलाफ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, कनाडा और यूरोप की सुरक्षा एजेंसियां भी संयुक्त कार्रवाई कर रही हैं।
हाल ही में अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी एफबीआई द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठित अपराध अब किसी एक देश की समस्या नहीं रह गया है। जब एक गिरोह की जड़ें कई महाद्वीपों तक फैल जाएं, उसके सदस्य विभिन्न देशों में बैठकर अपराधों का संचालन करें और आर्थिक संसाधनों का प्रवाह सीमाओं के पार हो, तब उससे निपटने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य हो जाता है। अमेरिका, कनाडा और यूरोप में एक साथ छापेमारी तथा बड़ी संख्या में संदिग्धों की गिरफ्तारी इसी बदलती रणनीति का हिस्सा है।
लॉरेंस बिश्नोई का जन्म पंजाब में हुआ। छात्र जीवन में वह छात्र राजनीति से जुड़ा और वहीं से अपराध की दुनिया में उसका प्रवेश माना जाता है। शुरुआती दौर में हत्या, मारपीट और गैंगवार के मामलों में उसका नाम सामने आया। समय के साथ उसने अपने नेटवर्क का विस्तार किया और पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़ तथा अन्य राज्यों में सक्रिय अपराधियों को जोड़कर एक व्यापक गिरोह तैयार किया। बाद में विदेशों में बैठे सहयोगियों के माध्यम से इस नेटवर्क ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप भी ग्रहण कर लिया।
भारतीय जांच एजेंसियों के अनुसार इस गिरोह का संचालन केवल स्थानीय अपराधों तक सीमित नहीं रहा। रंगदारी वसूली, सुपारी लेकर हत्या, अवैध हथियारों की आपूर्ति, मादक पदार्थों की तस्करी, हवाला नेटवर्क और विदेशों में बैठे सहयोगियों के माध्यम से धन के लेन-देन जैसी गतिविधियों के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। कई मामलों में यह भी आरोप लगे कि सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर गिरोह अपने सदस्यों तक निर्देश पहुंचाता था, जिससे जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुईं।
लॉरेंस बिश्नोई का नाम सबसे अधिक उस समय चर्चा में आया जब उसने अभिनेता ** को कथित रूप से धमकी दी। इसके बाद कई चर्चित हत्याओं और गैंगवार में भी उसके नेटवर्क का नाम सामने आया। यद्यपि प्रत्येक मामले में न्यायालय का अंतिम निर्णय ही दोष तय करता है, लेकिन इन घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता अवश्य बढ़ाई।
यह भी उल्लेखनीय है कि जेल में बंद रहने के बावजूद उसके गिरोह की गतिविधियां जारी रहने के आरोप लगते रहे हैं। इससे भारतीय जेल व्यवस्था, डिजिटल निगरानी और अपराधियों के संचार तंत्र पर भी गंभीर प्रश्न उठे। यदि कोई आरोपी जेल से ही अपना नेटवर्क संचालित करने में सक्षम हो जाता है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था का भी विषय बन जाता है।
एफबीआई की हालिया कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संदेश गया है कि संगठित अपराध चाहे किसी भी देश से संचालित हो, यदि उसकी गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को प्रभावित करती हैं तो वैश्विक एजेंसियां मिलकर कार्रवाई कर सकती हैं। आधुनिक अपराध अब स्थानीय नहीं रहा। धन एक देश से आता है, हथियार दूसरे देश से और अपराध की योजना तीसरे देश में बनती है। ऐसे में सूचना साझाकरण, संयुक्त जांच और कानूनी सहयोग ही सबसे प्रभावी उपाय बनते जा रहे हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी है। किसी भी आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की पुष्टि न्यायालय में साक्ष्यों के आधार पर ही होती है। कानून का मूल सिद्धांत यही है कि दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार प्राप्त है। इसलिए जांच एजेंसियों की कार्रवाई और न्यायालय की अंतिम सुनवाई—दोनों का अपना-अपना महत्व है।
भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ऐसे नेटवर्क की आर्थिक और आपराधिक जड़ों तक पहुंचा जा सकता है। चुनौती इसलिए कि केवल अपराधियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी। उनके वित्तीय स्रोतों, हवाला चैनलों, अवैध हथियारों की आपूर्ति, जेलों से होने वाले संचालन और डिजिटल संचार तं…


