नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के खिलाफ दायर याचिका को मंगलवार को खारिज करते हुए द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका यह तय नहीं कर सकती कि किसी मुख्यमंत्री को कब, कहां और किस उद्देश्य से जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी करते हुए पूछा, “क्या अब मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए, यह भी कोर्ट तय करेगा?” अदालत ने कहा कि कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप उचित नहीं है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ करूर भगदड़ मामले के पीड़ितों और उनके परिजनों से मुख्यमंत्री विजय की मुलाकात पर रोक लगाने संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि किसी दुखद घटना के बाद मुख्यमंत्री का पीड़ित परिवारों से मिलना उनके संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्व का हिस्सा है। इसे गवाहों को प्रभावित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के मंत्रियों पर गवाहों को प्रभावित करने के आरोपों पर भी सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें संबंधित जांच एजेंसी या सक्षम मंच के समक्ष रखा जा सकता है, लेकिन केवल आशंकाओं के आधार पर मुख्यमंत्री के दौरे पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी को कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। कोर्ट ने दोहराया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार के प्रमुख के प्रशासनिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।


