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Tuesday, July 7, 2026

सोशल मीडिया मानसिक प्रयास को कैसे महत्व देता है

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डॉ विजय गर्ग
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह केवल संचार और मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह हमारी सोचने-समझने, सीखने और मानसिक प्रयास करने की प्रवृत्तियों को भी प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया हमारे मस्तिष्क के उस तरीके को बदल रहा है, जिसके माध्यम से हम मानसिक मेहनत और उसके प्रतिफल को महत्व देते हैं।

मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से उन गतिविधियों की ओर आकर्षित होता है, जिनसे तुरंत आनंद या संतुष्टि मिलती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इसी मनोविज्ञान का लाभ उठाते हैं। लाइक, कमेंट, शेयर और नोटिफिकेशन जैसी सुविधाएं तत्काल खुशी और मान्यता का अनुभव कराती हैं। इससे मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का स्राव होता है, जो आनंद और प्रेरणा से जुड़ा होता है। परिणामस्वरूप, हमारा मस्तिष्क धीरे-धीरे उन कार्यों को अधिक पसंद करने लगता है, जिनमें कम प्रयास और तुरंत परिणाम मिलते हैं।

इसके विपरीत, पढ़ाई, शोध, पुस्तक-पठन, नई भाषा सीखना या किसी जटिल समस्या का समाधान करना जैसे कार्य अधिक मानसिक परिश्रम और धैर्य की मांग करते हैं। इन गतिविधियों का लाभ लंबे समय में मिलता है, लेकिन सोशल मीडिया की त्वरित संतुष्टि के सामने वे कम आकर्षक प्रतीत होने लगते हैं। इससे लोगों, विशेषकर युवाओं, में लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने और गहन अध्ययन करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया केवल नकारात्मक प्रभाव डालता है। यदि इसका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए, तो यह शिक्षा, ज्ञान-विनिमय और रचनात्मकता का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है। अनेक शैक्षणिक चैनल, विशेषज्ञों के व्याख्यान और प्रेरणादायक सामग्री लोगों को नई चीजें सीखने और अपने कौशल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसलिए, समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के तरीके में है।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों और युवाओं को पढ़ने, खेलकूद, कला, रचनात्मक गतिविधियों और बिना किसी डिजिटल व्यवधान के अध्ययन करने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। उन्हें यह समझाना चाहिए कि कठिन मानसिक प्रयास से प्राप्त उपलब्धियां अधिक स्थायी और संतोषजनक होती हैं।

अंततः, सोशल मीडिया हमारे मस्तिष्क में मानसिक प्रयास के मूल्यांकन की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। यह त्वरित संतुष्टि को बढ़ावा देता है, जबकि गहन चिंतन और दीर्घकालिक प्रयासों का महत्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसलिए, आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठाते हुए भी अपनी एकाग्रता, धैर्य और मेहनत करने की क्षमता को बनाए रखें। तभी हम तकनीक और मानवीय बौद्धिक विकास के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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