
– यहां प्रतिभा से पहले धारणा पैदा की जाती है
– फिर उसी धारणा को सच साबित करने की कोशिश होती है।
– जो जितना आगे बढ़ता है, उसके खिलाफ उतनी ही तेजी से अफवाहें चलती हैं।
– अपरा काशी की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि यहां प्रतिभा नहीं
– बल्कि यह है कि यहां प्रतिभा को पनपने नहीं दिया जाता।
शरद कटियार
फर्रुखाबाद…!यह केवल एक जिला नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, साहित्य और शौर्य की विरासत है। यह वह धरती है जिसने देश को अनेक विद्वान, साहित्यकार, समाजसेवी और जनप्रतिनिधि दिए। लेकिन आज जब इस मिट्टी को देखा जाता है तो सबसे बड़ा दर्द यह नहीं होता कि यहां संसाधनों की कमी है, बल्कि यह होता है कि यहां सोच की कमी पैदा कर दी गई है।
यहां एक अजीब परंपरा विकसित हो चुकी है। कोई व्यक्ति मेहनत करके आगे बढ़ने लगे, समाज में सम्मान पाने लगे या लोगों को साथ लेकर कुछ नया करने की कोशिश करे, उससे पहले उसके खिलाफ एक धारणा गढ़ दी जाती है। फिर उस धारणा को चाय की दुकानों,गावों, शीतलयों, गलियों,चौपालों, सोशल मीडिया और निजी बैठकों में इस तरह दोहराया जाता है कि झूठ भी धीरे-धीरे सच जैसा लगने लगता है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब इस अभियान में विरोधी नहीं, बल्कि अपने ही लोग शामिल हो जाते हैं। सजातीय, रिश्तेदार, मित्र और परिचित जो किसी की ताकत बनने चाहिए, वही कई बार उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बना दिए जाते हैं। किसी के संघर्ष को देखने के बजाय उसकी आलोचना करने की होड़ लग जाती है।
फर्रुखाबाद में अक्सर व्यक्ति की योग्यता पर चर्चा कम और उसके बारे में बनाई गई झूठी राय पर चर्चा अधिक होती है। कोई कितना पढ़ा-लिखा है, कितना ईमानदार है, समाज के लिए कितना समर्पित है, उसकी क्या सेवा और त्याग है यह सब पीछे छूट जाता है। आगे रहती है केवल वह धारणा, जिसे कुछ लोग अपने या कुछ लोगों, दलों, या फिर आपराधिक तत्वों के स्वार्थ के लिए गढ़ते और फैलाते हैं।
यह भी एक दुर्भाग्य है कि जब कोई व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बनाने लगता है, तब कुछ छोटे राजनीतिक स्वार्थ भी उसके रास्ते में दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं कोई नया चेहरा लोगों का विश्वास न जीत ले। परिणाम यह होता है कि प्रतिभाएं राजनीति की भेंट चढ़ जाती हैं और समाज फिर वहीं खड़ा रह जाता है, जहां वर्षों पहले था।
शायद यही कारण है कि फर्रुखाबाद आज भी उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी वह क्षमता रखता है। यह वही जनपद है, जिसने खुर्शीद आलम और ब्रह्मदत्त द्विवेदी जैसे प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों को देखा। आज भी यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने का वातावरण नहीं मिल पाता।
सबसे अधिक चिंता युवाओं को लेकर होती है। नई पीढ़ी को प्रेरणा देने के बजाय कई बार उन्हें भ्रम परोसा जाता है। कुछ लोग अपने अनुभव और उम्र का प्रभाव दिखाकर युवाओं के मन में अच्छे और कर्मठ लोगों के प्रति अविश्वास भर देते हैं। परिणाम यह होता है कि युवा आदर्श नहीं खोजते, बल्कि संदेह करना सीख जाते हैं। वे व्यक्तित्व नहीं देखते, बल्कि अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं।
आज का भारत बदल रहा है। नई सोच, नई तकनीक और नए अवसरों का दौर है। लेकिन यदि समाज अपने ही लोगों को गिराने में ऊर्जा खर्च करेगा, तो विकास की यह दौड़ अधूरी रह जाएगी। धन कमाना बुरा नहीं, लेकिन यदि धन के लिए चरित्र, सम्मान और समाज की एकता को दांव पर लगा दिया जाए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल आर्थिक रूप से समृद्ध होंगी, मानसिक और सामाजिक रूप से नहीं।
फर्रुखाबाद को आज सबसे अधिक आवश्यकता किसी नए पुल, सड़क या भवन की नहीं, बल्कि नई सोच की है।ऐसी सोच, जो किसी उभरते व्यक्ति को गिराने के बजाय उसका हाथ थामे।
ऐसी सोच, जो अफवाहों से नहीं, उपलब्धियों से पहचान बनाए।
ऐसी सोच, जो अपने लोगों पर गर्व करना सिखाए।
क्योंकि जिस दिन फर्रुखाबाद अपने योग्य लोगों को पहचानना और उनका सम्मान करना सीख जाएगा, उसी दिन अपरा काशी का खोया हुआ गौरव फिर लौट आएगा।और यहाँ का समाज, यहाँ के भ्रमित युवा सजने और सवरने लगेंगे और शायद उस दिन कोई यह नहीं कहेगा कि “यहां प्रतिभाएं नहीं टिकतीं”, बल्कि लोग गर्व से कहेंगे
“फर्रुखाबाद अपने लोगों को आगे बढ़ाना जानता है।”


