– मोहित धवन
रविवार की शाम को लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम में सभागार में हल्की-सी हँसी गूँजती है। मंच पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डॉ. ब्रजेश पाठक बोल रहे हैं। वे नवाबों के दौर का एक पुराना किस्सा सुनाते हैं—एक बार नवाब साहब की ट्रेन इसलिए छूट गई क्योंकि जूते पहनाने वाला समय पर नहीं पहुँचा। श्रोता मुस्कुरा देते हैं। लेकिन वह केवल एक हास्य प्रसंग नहीं था। उस छोटे-से किस्से में पुराने लखनऊ की पूरी जीवन-दृष्टि समाई हुई थी—एक ऐसा शहर जहाँ जल्दबाज़ी से अधिक महत्व सलीके, रिश्तों और ठहराव को दिया जाता था।
यहीं से शुरू होता है “भारत Talks – Lucknow 2026 : शहर, लोग और कहानियाँ” का सफर। भारत डायलॉग्स के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में शहर को इतिहास, साहित्य, पत्रकारिता, समाज और संस्कृति की अनेक दृष्टियों से समझने का प्रयास किया गया। यह केवल भाषणों का मंच नहीं था, बल्कि लखनऊ की आत्मा को टटोलने की एक सामूहिक कोशिश थी।
डॉ. ब्रजेश पाठक ने अपने संबोधन में एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि कभी लगभग 25 लाख की आबादी वाला लखनऊ आज 65 लाख से अधिक लोगों का शहर बन चुका है। शहर का आकार बदला है, रफ्तार बदली है, लेकिन इसके बावजूद उसकी तहज़ीब और सांस्कृतिक पहचान आज भी जीवित है। शायद यही लखनऊ की सबसे बड़ी ताकत है कि बदलावों के बीच भी उसने अपनी मूल आत्मा को पूरी तरह खोने नहीं दिया।
कार्यक्रम के संस्थापक विवेक सत्य मित्रम् मंच पर आए और केवल एक वाक्य कहा—“क्या आप लखनऊ में हैं? तो मुस्कुराइए।” यह कोई नारा नहीं था, बल्कि उस पूरे आयोजन का सार था। लगा मानो लखनऊ की सबसे छोटी और सबसे सुंदर परिभाषा यही है कि यहाँ मुस्कुराना अभी भी संस्कृति का हिस्सा है।
इसके बाद वक्ता बदलते रहे, लेकिन चर्चा बार-बार उसी शहर पर लौट आती रही, जो नक्शे पर जितना बड़ा है, यादों में उससे कहीं अधिक विशाल है।
इतिहासकार रवि भट्ट ने कहा कि लखनऊ ने दुनिया को गंगा-जमुनी तहज़ीब और धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक दृष्टि की विरासत दी है। उन्होंने याद दिलाया कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों या स्मारकों से नहीं बनती। शहर को उसकी आत्मा साहित्यकार देते हैं, संगीतकार देते हैं, कलाकार देते हैं और वे सामान्य लोग देते हैं जो रोज़मर्रा की जिंदगी में संस्कृति को जीते हैं।
जब यूनिवर्सल बुक डिपो के संचालक चंद्र प्रकाश अपने पिता लाला गोविंद राम का उल्लेख कर रहे थे, तब वह केवल एक किताबों की दुकान की कहानी नहीं थी। वह उस समय का स्मरण था जब पुस्तकें बेचना भी समाज को शिक्षित करने का माध्यम माना जाता था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1930 में उनके पिता लखनऊ आए और पुस्तकों तथा पत्रिकाओं के माध्यम से कई पीढ़ियों को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ा। यह प्रसंग बताता है कि किसी शहर की बौद्धिक विरासत केवल विश्वविद्यालयों में नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी दुकानों में भी बसती है जहाँ पीढ़ियाँ किताबों से दोस्ती करना सीखती हैं।
नवभारत टाइम्स के रेजिडेंट एडिटर सुधीर मिश्रा ने एक ऐसा वाक्य कहा, जो देर तक मन में गूंजता रहा—“लखनऊ आपको आपके अतीत से नहीं, बल्कि आपके वर्तमान से पहचानता है।” शायद यही कारण है कि यह शहर बाहर से आने वाले लोगों को भी अपनेपन का एहसास करा देता है।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी ने लखनऊ को एक उत्सव बताया। उन्होंने आग्रह किया कि “पुराना लखनऊ” कहना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि शहर की असली आत्मा आज भी उन्हीं गलियों में साँस लेती है जिन्हें हम अक्सर पुराने शहर के नाम से पुकारते हैं।
साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के पौत्र प्रो. चंद्रशेखर वर्मा ने लखनऊ की पहचान उसकी सहज मुस्कान में खोजी। उन्होंने कहा कि कई शहरों में लोग बिना किसी कारण गंभीर दिखाई देते हैं, लेकिन लखनऊ आज भी मुस्कुराकर संवाद शुरू करना जानता है। शायद यही मुस्कान इस शहर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर है।
सामाजिक कार्यकर्ता माधवी कुकरेजा ने लखनऊ को किसी इतिहास की पुस्तक से नहीं, बल्कि उसकी गलियों, प्रसिद्ध बाजपेयी पूड़ी, मोहर्रम के ताज़ियों और रोजमर्रा के जीवन के माध्यम से याद किया। उनके शब्दों में लखनऊ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जीने का एक अंदाज़ बनकर सामने आया।
कार्यक्रम के अंतिम वक्ताओं में शामिल प्रसिद्ध लेखक डॉ. हिमांशु बाजपेयी ने जैसे पूरे संवाद को एक वाक्य में समेट दिया। उन्होंने कहा, “लखनऊ मेरे लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक ख़्वाब और एक विचार है।” लेकिन उसी के साथ उन्होंने एक चिंता भी व्यक्त की। उनका कहना था कि आधुनिक जीवनशैली के बीच मोहल्लों का अपनापन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बीच बने रिश्तों से होती है। यदि वे रिश्ते कमजोर पड़ते हैं, तो शहर केवल भूगोल बनकर रह जाते हैं।
करीब तीन घंटे तक चले इस संवाद में अनेक विचार सामने आए, लेकिन सभी का निष्कर्ष एक ही था—लखनऊ को समझना हो तो उसके स्मारकों से पहले उसके लोगों को समझना होगा।
कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोग सभागार से बाहर निकलने लगे। बाहर वही भागता-दौड़ता महानगर था—तेज़ ट्रैफिक, हॉर्न और व्यस्त ज़िंदगी। लेकिन भीतर एक सवाल अब भी ठहरा हुआ था—
क्या लखनऊ आज भी हमारे भीतर बसता है, या वह केवल किस्सों और यादों में सिमटता जा रहा है?
शायद इसका उत्तर किसी इतिहास की किताब में नहीं मिलेगा। उसे खोजने के लिए चौक की गलियों में टहलना होगा, किसी पुराने किताबघर में बैठना होगा, किसी चाय की दुकान पर अनजान लोगों से बात करनी होगी और किसी मुस्कुराते चेहरे से मिलना होगा।
क्योंकि शहर इमारतों से नहीं बनते।
शहर अपने लोगों से बनते हैं।
और शायद इसी कारण, लखनऊ आज भी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति, एक एहसास और एक ख़ूबसूरत विचार बना हुआ है।


