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Thursday, June 25, 2026

हमने इतिहास से क्या सीखा, या केवल तारीखें याद रखीं

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शरद कटियार
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह दिन है, जिसे संविधान, सत्ता और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में हमेशा याद किया जाएगा। उस दिन आपातकाल लागू हुआ और देश ने लगभग 21 महीने तक ऐसा दौर देखा, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हुई, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर बहस छिड़ गई।

आज, पांच दशक से अधिक समय बाद, जब हम उस दौर को याद करते हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उस समय कौन सत्ता में था। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमने उस इतिहास से कोई स्थायी सीख ली?

लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह रहे, न्यायपालिका स्वतंत्र रहे, मीडिया निर्भीक होकर प्रश्न पूछ सके, विपक्ष अपनी भूमिका निभा सके और आम नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सके। जब इनमें से किसी भी स्तंभ पर दबाव बढ़ता है या उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तब लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

आज देश में राजनीतिक बहसें अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाती हैं। एक पक्ष दूसरे पर लोकतंत्र कमजोर करने का आरोप लगाता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक प्रचार बताता है। ऐसे माहौल में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान के अनुसार निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से काम करती रहें।

समय-समय पर भ्रष्टाचार, परीक्षा अनियमितताओं, प्रशासनिक लापरवाही, अवैध निर्माण, कानून-व्यवस्था और शासन से जुड़े अनेक मामले सामने आते हैं। साथ ही, कई मामलों में जांच, न्यायिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक कार्रवाई भी होती है। इसलिए किसी एक घटना या धारणा के आधार पर पूरे तंत्र का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र की मजबूती का आकलन व्यापक तथ्यों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और नागरिक अधिकारों की स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए।

इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि सत्ता किसी भी दल के पास हो, उसका मूल्यांकन संविधान और कानून की कसौटी पर होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना भी आवश्यक है और उसकी उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी। दोनों में संतुलन ही स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की पहचान है।

आपातकाल की स्मृति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की किताबों से नहीं होती। इसके लिए जागरूक नागरिक, जवाबदेह सरकार, स्वतंत्र संस्थाएं, सक्रिय विपक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता आवश्यक हैं। जब ये सभी अपने-अपने दायित्व निभाते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।
आज भी सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि राजनीति सेवा का माध्यम बने, प्रशासन पारदर्शी हो, भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगे, न्याय समय पर मिले और जनता का विश्वास संस्थाओं में बना रहे। लोकतंत्र की असली शक्ति किसी एक नेता, दल या सरकार में नहीं, बल्कि संविधान और जनता के विश्वास में निहित होती है।
इतिहास को याद करने का उद्देश्य अतीत के विवादों को दोहराना नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाना है। यदि आपातकाल की स्मृति हमें अधिक जवाबदेह शासन, अधिक स्वतंत्र संस्थाओं और अधिक जागरूक नागरिक समाज की ओर प्रेरित करती है, तभी उस इतिहास को याद करने का वास्तविक अर्थ पूरा होगा।

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