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Thursday, June 25, 2026

हादसे के बाद जागा सिस्टम, अब सुरक्षा संस्कृति बनाना होगी प्राथमिकता

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लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या हम किसी बड़े हादसे से पहले सुरक्षा मानकों को गंभीरता से लेते हैं? उत्तर प्रदेश में इसके बाद जिस तरह प्रशासन ने प्रदेशव्यापी अभियान चलाकर मानकविहीन कोचिंग संस्थानों, लाइब्रेरी और अन्य शैक्षणिक प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई शुरू की है, वह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा प्रश्न है कि जिन संस्थानों पर आज ताले लगाए जा रहे हैं, वे आखिर वर्षों तक बिना आवश्यक अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था के कैसे संचालित होते रहे?

प्रदेश के कई जिलों में कोचिंग संस्थानों को सील किया गया है। कहीं फायर एनओसी नहीं मिली, कहीं भवन का स्वीकृत मानचित्र नहीं था तो कहीं आपातकालीन निकास की व्यवस्था ही नहीं थी। बिजनौर के नगीना में जब जांच टीम ने लाइब्रेरी संचालक से पूछा कि आग लगने पर छात्रों को कैसे बचाया जाएगा, तो कथित तौर पर मिला जवाब—”खिड़की से कूद जाएंगे”—सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रतीक है। यह बताता है कि अनेक संस्थानों में सुरक्षा को केवल औपचारिकता समझा गया।

यह कार्रवाई केवल कोचिंग संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। होटल, अस्पताल, मॉल, बैंक्वेट हॉल, छात्रावास, निजी स्कूल, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और बहुमंजिला इमारतों का भी नियमित सुरक्षा ऑडिट आवश्यक है। किसी भवन में प्रवेश से पहले यह विश्वास होना चाहिए कि वहां आग या अन्य आपदा की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था मौजूद है।

यह भी जरूरी है कि प्रशासन का अभियान केवल कुछ दिनों की कार्रवाई बनकर न रह जाए। अक्सर बड़े हादसे के बाद सख्ती दिखाई जाती है, लेकिन समय बीतने के साथ निरीक्षण धीमे पड़ जाते हैं और नियम फिर कागजों तक सीमित हो जाते हैं। यदि ऐसा हुआ तो वर्तमान अभियान का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। सुरक्षा व्यवस्था को स्थायी प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा।

दूसरी ओर, संस्थान संचालकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। शिक्षा एक सेवा है और छात्रों का जीवन सबसे बड़ी जिम्मेदारी। यदि कोई संचालक फायर एनओसी, अग्निशमन यंत्र, इमरजेंसी एग्जिट और भवन सुरक्षा जैसे मूलभूत मानकों पर खर्च बचाने की कोशिश करता है, तो वह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के भरोसे से भी खिलवाड़ करता है।

सरकार को भी चाहिए कि कार्रवाई के साथ-साथ एक पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था विकसित करे, जिसमें प्रत्येक कोचिंग संस्थान और सार्वजनिक भवन की फायर एनओसी, भवन स्वीकृति, सुरक्षा निरीक्षण और वैधता की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। इससे अभिभावक और छात्र भी सुरक्षित संस्थान का चयन कर सकेंगे और जवाबदेही बढ़ेगी।

लखनऊ का हादसा केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि व्यवस्था को बदलने का अवसर भी है। यदि इस अभियान के माध्यम से सुरक्षा मानकों का ईमानदारी से पालन सुनिश्चित हो जाता है, तो यह प्रदेश के लाखों छात्रों और नागरिकों के जीवन की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। कानून का उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जहां भविष्य में किसी परिवार को सुरक्षा में हुई लापरवाही की कीमत अपने प्रियजनों की जान देकर न चुकानी पड़े।

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