लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने अथवा उन्हें मजहवार जाति का पर्याय मानने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने या उसमें संशोधन करने का अधिकार केवल संसद के पास है।
यह फैसला चंद्रशेखर निषाद द्वारा दाखिल याचिका पर सुनाया गया। याचिका में मांग की गई थी कि निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समुदाय को मजहवार जाति का पर्याय मानते हुए अनुसूचित जाति का लाभ दिया जाए।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत अनुसूचित जातियों की सूची में किसी जाति को जोड़ना, हटाना या संशोधन करना विधायी प्रक्रिया का विषय है। यह कार्य संसद द्वारा कानून बनाकर ही किया जा सकता है और न्यायालय अपने आदेश से ऐसा नहीं कर सकता।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि इस प्रकार की मांग पर फैसला लेने का अधिकार न्यायपालिका के बजाय संसद और केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए न्यायालय इस संबंध में कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने याचिका को गुणहीन मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद संबंधित समुदायों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किए जाने का मुद्दा अब विधायी और नीतिगत स्तर पर ही आगे बढ़ सकेगा।
फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि किसी भी जाति की सामाजिक श्रेणी में परिवर्तन या उसे अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।


