प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति भारत की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। लेकिन इसी युवा भारत में एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन भी दिखाई दे रहा है। कभी जहां युवाओं के बीच विचारधारा, सामाजिक परिवर्तन, राष्ट्र निर्माण और राजनीतिक आंदोलनों की चर्चा प्रमुख हुआ करती थी, वहीं आज आर्थिक सफलता, करियर, स्टार्टअप, निवेश और व्यक्तिगत समृद्धि नई प्राथमिकताएं बन चुकी हैं। यह बदलाव केवल जीवनशैली का नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता में आ रहे परिवर्तन का संकेत है।
एक समय था जब युवाओं की पहचान किसी विचारधारा, आंदोलन या सामाजिक सरोकार से जुड़ी होती थी। विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में बहसें देश की दिशा और दशा को लेकर होती थीं। राजनीति को परिवर्तन का माध्यम माना जाता था। युवाओं के आदर्श स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और वैचारिक नेता होते थे। लेकिन आज का युवा पहले अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करना चाहता है। उसके लिए विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण रोजगार, आय और जीवन स्तर बन गया है।
इस परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं। वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति और इंटरनेट ने दुनिया को एक बाजार में बदल दिया है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सफलता की नई परिभाषा गढ़ी है। आज युवा के सामने आदर्श के रूप में कोई राजनीतिक विचारक नहीं, बल्कि सफल उद्यमी, निवेशक, यूट्यूबर, इन्फ्लुएंसर और कॉर्पोरेट नेता खड़े हैं। समाज में सम्मान का आधार भी तेजी से आर्थिक सफलता बनता जा रहा है।
भारत में पिछले एक दशक के दौरान स्टार्टअप संस्कृति ने अभूतपूर्व विस्तार पाया है। युवा अब नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने का सपना देख रहा है। शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल कारोबार और ऑनलाइन उद्यमिता जैसे शब्द आम चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं। यह परिवर्तन सकारात्मक भी है क्योंकि इससे आत्मनिर्भरता, नवाचार और आर्थिक विकास को गति मिल रही है।
हालांकि अर्थयुग के इस बढ़ते प्रभाव के कुछ चिंताजनक पहलू भी हैं। आर्थिक सफलता की दौड़ में सामाजिक संवेदनशीलता, सामूहिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर होती दिखाई दे रही है। समाज का बड़ा वर्ग अब हर मुद्दे को आर्थिक लाभ और हानि के चश्मे से देखने लगा है। नैतिकता, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक हित जैसे विषय कई बार पीछे छूट जाते हैं। युवाओं का एक वर्ग राजनीति और सामाजिक मुद्दों से दूरी बनाकर केवल व्यक्तिगत उन्नति पर केंद्रित हो गया है।
यह भी सच है कि बेरोजगारी, महंगाई और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को व्यावहारिक बना दिया है। जब अस्तित्व और भविष्य की चिंता सामने हो तो विचारधारा की जगह आर्थिक सुरक्षा लेना स्वाभाविक है। इसलिए इस बदलाव को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यह समय और परिस्थितियों से उपजा सामाजिक परिवर्तन भी है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी युवा शक्ति को केवल आर्थिक संसाधन न बनने दे, बल्कि उसे सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से भी जोड़े रखे। आर्थिक समृद्धि और वैचारिक जागरूकता दोनों का संतुलन ही किसी राष्ट्र को स्थायी रूप से मजबूत बनाता है। केवल विचारधारा से विकास नहीं होता और केवल धन से समाज नहीं बनता।
आज का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां युवा शक्ति अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। लेकिन यदि आर्थिक सफलता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय सरोकारों का संतुलन बना रहा, तभी यह युवा प्रधान देश वास्तव में विश्व नेतृत्व की ओर बढ़ सकेगा। यही बदलते भारत और उभरते अर्थयुग की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री युवा तुर्क चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


