शरद कटियार
अयोध्या में श्रीराम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, संघर्ष, समर्पण और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। ऐसे में यदि मंदिर में चढ़ावे की राशि को लेकर अनियमितता, चोरी या वित्तीय गड़बड़ी जैसे आरोप सामने आते हैं, तो यह मामला सामान्य आर्थिक विवाद से कहीं अधिक गंभीर हो जाता है। यह सीधे-सीधे उन करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास से जुड़ा विषय बन जाता है जिन्होंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार मंदिर निर्माण और उसकी व्यवस्थाओं में योगदान दिया है।
हाल के दिनों में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित तौर पर 7 करोड़ रुपये की गड़बड़ी या चोरी के आरोपों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। मामला तब और गंभीर हो गया जब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ ) द्वारा इस संबंध में रिपोर्ट तलब किए जाने की खबर सामने आई। विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि मंदिर ट्रस्ट और उससे जुड़े पदाधिकारी आरोपों को खारिज करते हुए आंतरिक ऑडिट और व्यवस्थागत पारदर्शिता का हवाला दे रहे हैं।
लोकतंत्र में आरोप और प्रत्यारोप नई बात नहीं हैं, लेकिन राम मंदिर जैसा संवेदनशील विषय राजनीति से ऊपर होना चाहिए। यदि किसी पक्ष द्वारा वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया गया है, तो उसका सबसे उचित जवाब राजनीतिक बयान नहीं बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो सकती है। सवाल यह नहीं है कि आरोप किसने लगाया, बल्कि सवाल यह है कि आरोपों की सच्चाई क्या है।
राम मंदिर में प्रतिदिन लाखों रुपये का चढ़ावा आता है। त्योहारों और विशेष अवसरों पर यह राशि कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में धनराशि की गणना, संग्रहण, सुरक्षा और बैंकिंग प्रक्रिया को लेकर पारदर्शी व्यवस्था होना अनिवार्य है। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी निजी एजेंसी, बैंकिंग संस्था या अन्य माध्यमों की भूमिका है तो उनकी जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है तो जांच से डरने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। बल्कि एक स्वतंत्र जांच सभी प्रकार के संदेहों को समाप्त कर सकती है। वहीं यदि किसी स्तर पर लापरवाही, भ्रष्टाचार या गड़बड़ी सामने आती है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होना भी उतना ही आवश्यक है। आस्था के नाम पर किसी को भी जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती।
इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि आखिर धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता का मानक क्या होना चाहिए? देश के बड़े धार्मिक स्थलों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। ऐसे में समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट, डिजिटल निगरानी, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग का सार्वजनिक सत्यापन और वित्तीय रिपोर्टों का खुला प्रकाशन विश्वास को और मजबूत कर सकता है।
विपक्ष द्वारा सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग भी इसी संदर्भ में देखी जा रही है। यदि किसी घटना को लेकर विवाद खड़ा हुआ है तो तथ्यों को सामने लाना ही सबसे प्रभावी उपाय है। अफवाहों, राजनीतिक आरोपों और सोशल मीडिया अभियानों से कहीं बेहतर है कि साक्ष्यों के आधार पर सच्चाई देश के सामने रखी जाए।
राम मंदिर आंदोलन दशकों के संघर्ष का परिणाम है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का केंद्र है। इसलिए मंदिर से जुड़ा प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक वित्तीय लेन-देन और प्रत्येक प्रशासनिक प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर कोई उंगली न उठा सके।
आज आवश्यकता आरोपों के राजनीतिक इस्तेमाल की नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना की है। यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाना चाहिए और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए। क्योंकि राम मंदिर की सबसे बड़ी पूंजी उसका चढ़ावा नहीं, बल्कि देश के करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास है। और विश्वास की रक्षा किसी भी कीमत पर होनी चाहिए।


