भरत चतुर्वेदी
लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है। राजनीतिक दल एक-दूसरे की नीतियों, निर्णयों और कार्यशैली की आलोचना करते हैं। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान भी है। लेकिन जब राजनीतिक बहस नेताओं के परिवारों और विशेष रूप से उनकी बेटियों तक पहुंच जाती है, तब यह केवल राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं बल्कि समाज की गिरती मानसिकता का भी प्रमाण बन जाती है।
भारत की संस्कृति में बेटियों को सम्मान, स्नेह और संस्कार का प्रतीक माना गया है। समाज चाहे किसी भी विचारधारा, धर्म, जाति या राजनीतिक दल से जुड़ा हो, बेटियों के सम्मान को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ऐसे में किसी राजनीतिक मतभेद या विरोध के कारण किसी की बेटी को निशाना बनाना सभ्य समाज की सोच नहीं हो सकती।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कई बार व्यक्तिगत हमलों का रूप ले लेती है। विरोधियों को घेरने के लिए उनके परिवारों और बच्चों तक को विवादों में घसीटा जाता है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक संस्कृति को दूषित नहीं करती बल्कि समाज को भी गलत संदेश देती है।
किसी नेता की आलोचना उसके काम, विचार और राजनीतिक निर्णयों के आधार पर होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता और विपक्ष को यह पूरा अधिकार है। लेकिन किसी की बेटी, बहन या परिवार के सदस्य को राजनीतिक निशाना बनाना न तो लोकतांत्रिक मूल्य है और न ही नैतिकता।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तरह की टिप्पणियां अक्सर उन लोगों द्वारा भी की जाती हैं जो सार्वजनिक मंचों से महिला सम्मान, बेटी बचाओ और महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं। कथनी और करनी का यह अंतर समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
राजनीतिक दलों को भी इस विषय पर आत्ममंथन करना होगा। चुनाव जीतने या राजनीतिक लाभ लेने के लिए यदि व्यक्तिगत और पारिवारिक हमलों को हथियार बनाया जाएगा तो लोकतांत्रिक संवाद का स्तर लगातार गिरता जाएगा। इससे राजनीतिक असहमति शत्रुता में बदल जाएगी और समाज में कटुता बढ़ेगी।
यह समझना आवश्यक है कि किसी भी बेटी की पहचान उसके पिता, परिवार या राजनीतिक विचारधारा से पहले एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में है। उसे राजनीतिक विवादों का हिस्सा बनाना उसके सम्मान और निजता दोनों पर आघात है।
समाज की परिपक्वता इसी में है कि वह महिलाओं और बेटियों को राजनीतिक हथियार बनने से बचाए। असली राजनीतिक लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, परिवारों की नहीं। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब बहस मुद्दों पर होगी, व्यक्तियों पर नहीं; और आलोचना नीतियों की होगी, बेटियों की नहीं।
बेटियों पर टिप्पणी करना राजनीतिक साहस नहीं, बल्कि ओछी मानसिकता का परिचायक है। जिस समाज में बेटियों का सम्मान सुरक्षित रहेगा, वही समाज वास्तव में सभ्य और प्रगतिशील कहलाएगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं


