प्रयागराज। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की बार-बार होने वाली हड़तालों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना समय की जरूरत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा सेवाओं के बाधित होने से सबसे अधिक नुकसान आम मरीजों को उठाना पड़ता है, इसलिए ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
स्वरूप रानी नेहरू (एसआरएन) अस्पताल में अधिवक्ताओं और डॉक्टरों के बीच हुए विवाद तथा अधिवक्ता जागृति शुक्ला की मौत के मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अरुण टंडन इस पूरे प्रकरण की जांच करेंगे। जांच में यह भी देखा जाएगा कि घायल अधिवक्ता के उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही हुई या नहीं तथा अस्पताल में हुई मारपीट और उसके बाद की परिस्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार था।
जागृति शुक्ला 20 मई को सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उपचार के दौरान उनकी मौत के बाद अस्पताल में तनाव बढ़ गया था और डॉक्टरों तथा अधिवक्ताओं के बीच विवाद ने तूल पकड़ लिया था। इसके बाद डॉक्टरों की हड़ताल और चिकित्सा सेवाओं पर पड़े असर को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
अदालत ने टिप्पणी की कि सरकारी अस्पतालों में बार-बार होने वाली हड़तालें स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। न्यायालय ने संकेत दिया कि मरीजों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार का व्यवधान स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप को प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी अस्पतालों में कार्यसंस्कृति सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।अब न्यायिक जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी, जबकि पूरे मामले पर प्रदेशभर की निगाहें टिकी हुई हैं।


