– धामी सरकार के विशेष आमंत्रण ने गर्म की सियासी हवा
– यह वही स्वामी हैं जिन्हें यूपी में शंकराचार्य ही मानने से इनकार कर दिया गया था
शरद कटियार
देहरादून/हरिद्वार। वर्ष 2027 में हरिद्वार में आयोजित होने जा रहे अर्द्ध कुंभ को उत्तराखंड सरकार “कुंभ” के रूप में स्थापित करने की तैयारी के बीच जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को विशेष महत्व देते हुए आमंत्रण भेजा है। यह वही धर्मगुरु हैं जिन्हें यूपी की भाजपा सरकार ने शंकराचार्य ही मानने से इनकार कर दिया था 2027 में शंकराचार्य की नाराजगी को विराम देने की है कवायत मानी जा रही है।
राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा शंकराचार्य को विशेष आमंत्रण दिए जाने के पीछे केवल धार्मिक नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक सन्देश भी छिपा है। हालांकि सरकार की ओर से इसे संत सम्मान और सनातन परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है।
प्रयागराज महाकुंभ के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच उत्पन्न विवादों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। कई अवसरों पर शंकराचार्य ने गौसंरक्षण, सनातन परंपराओं और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकारों के प्रति खुलकर नाराजगी जताई थी ।
वर्तमान समय में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद उत्तर प्रदेश में गौमाता संरक्षण और उन्हें राष्ट्र माता का दर्जा देने की मांग को लेकर सक्रिय अभियान चला रहे हैं। वह राज्य की विभिन्न विधानसभाओं में जाकर जनता से सवाल पूछ रहे हैं कि यदि गौमाता भारतीय संस्कृति और सनातन आस्था का केंद्र हैं तो उनके संरक्षण के लिए ठोस और प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। उनकी सभाओं में यह मुद्दा लगातार प्रमुखता से उठ रहा है। और भाई को माता के नाम पर वोट मांगते भी दिख रहे हैं।
हाल ही में पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी उनका हस्तक्षेप चर्चा का विषय बना, जब उन्होंने गौवंश से जुड़े मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक विवादित बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड सरकार अच्छी तरह समझती है कि शंकराचार्य का प्रभाव केवल संत समाज तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में उनके अनुयायी और समर्थक मौजूद हैं। ऐसे में 2027 के हरिद्वार कुंभ से पहले यदि उनकी नाराजगी दूर होती है।
हरिद्वार देश के चार प्रमुख कुंभ स्थलों में से एक है और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र माना जाता है। 2027 का आयोजन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धामी सरकार शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को सम्मान देकर सनातन समाज में एक व्यापक एकजुटता का संदेश देना चाहती है, या फिर यह 2027 के महाआयोजन को लेकर संत समाज के भीतर किसी संभावित असंतोष को कम करने की रणनीति है?


