डॉ विजय गर्ग
एक समय था जब सुबह की शुरुआत चाय की प्याली और अख़बार के साथ होती थी। घर के दरवाज़े पर अख़बार के गिरने की आवाज़ लोगों के लिए किसी सूचना-घंटी से कम नहीं होती थी। लोग बेसब्री से अख़बार का इंतज़ार करते थे क्योंकि उसमें केवल खबरें ही नहीं, बल्कि समाज का सच, देश-दुनिया की धड़कन और जनमत की शक्ति समाई होती थी। उस दौर में अख़बार केवल कागज़ के पन्ने नहीं थे, बल्कि लोकतंत्र के सशक्त प्रहरी और जनता की आवाज़ थे।
अख़बारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी विश्वसनीयता थी। समाचार प्रकाशित होने से पहले तथ्यों की कई स्तरों पर जाँच की जाती थी। पत्रकार दूर-दराज़ क्षेत्रों में जाकर घटनाओं की पड़ताल करते थे और फिर प्रमाणों के आधार पर समाचार लिखते थे। यही कारण था कि अख़बार में छपी खबर को लोग सच मानते थे। उस समय यह कहावत प्रचलित थी कि “अगर अख़बार में छपा है, तो बात सही होगी।”
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी अख़बारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक समाचार पत्रों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध जनचेतना जगाई और लोगों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया। कई संपादकों और पत्रकारों ने सत्य लिखने की कीमत जेल जाकर चुकाई, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता की चापलूसी नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा करना था।
उस दौर के अख़बार समाज का दर्पण होते थे। उनमें राजनीति के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, शिक्षा और ग्रामीण जीवन से जुड़ी सामग्री भी प्रमुखता से प्रकाशित होती थी। संपादकीय लेख लोगों को सोचने पर मजबूर करते थे और पाठकों के पत्र समाज की नब्ज़ को सामने लाते थे। समाचारों में सनसनी कम और सार अधिक होता था।
आज सूचना क्रांति के युग में खबरें सेकंडों में मोबाइल स्क्रीन तक पहुँच जाती हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना के प्रसार को आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। अपुष्ट खबरें, अफवाहें, भ्रामक सूचनाएँ और क्लिकबेट संस्कृति ने समाचारों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। तेज़ी की दौड़ में कई बार सत्य पीछे छूट जाता है।
ऐसे समय में पुराने अख़बारों की पत्रकारिता हमें सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी का महत्व याद दिलाती है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सही जानकारी देना, सत्ता से सवाल पूछना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है। माध्यम चाहे प्रिंट हो या डिजिटल, पत्रकारिता की आत्मा सत्य ही होनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाचार संस्थान अपनी विश्वसनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और पाठक भी खबरों को समझदारी से पढ़ें। तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन सच की कीमत कभी कम नहीं होती। इसलिए जब हम कहते हैं कि “छपकर बिकते थे, सच के थे अख़बार”, तो यह केवल अतीत की याद नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उन आदर्शों का सम्मान है जिन्होंने समाज को दिशा दी और लोकतंत्र को मजबूत बनाया।
सच, साहस और जनहित—यही वे तीन स्तंभ थे जिन पर अख़बारों की प्रतिष्ठा खड़ी थी। आज भी यदि पत्रकारिता इन मूल्यों को अपनाए रखे, तो वह समाज के लिए उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली बनी रहेगी जितनी कभी हुआ करती थी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


