शरद कटियार
भारत की राजनीति में आज शायद ही कोई ऐसा दल हो जो सनातन, संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक विरासत की बात न करता हो। चुनावी मंचों से लेकर सरकारी समारोहों तक भारतीय संस्कृति का गुणगान किया जाता है। संतों और महापुरुषों के नाम पर योजनाएं बनती हैं, विशाल आयोजन होते हैं और सांस्कृतिक गौरव की लंबी-लंबी बातें कही जाती हैं। लेकिन कन्नौज में जो तस्वीर सामने आई, उसने इन दावों की सच्चाई पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जिस देश में शंकराचार्य की परंपरा को आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक विरासत का वाहक माना जाता है, उसी देश में एक शंकराचार्य को सड़क किनारे रात्रि विश्राम करना पड़े, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं कही जा सकती। यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें सत्ता स्वयं को परंपरा से बड़ा और प्रशासन स्वयं को समाज से ऊपर समझने लगता है।
कन्नौज में गौ रक्षार्थ धर्म यात्रा के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के रात्रि विश्राम को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ, वह अब केवल स्थानीय घटना नहीं रह गया है। यह राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। आरोप है कि प्रशासनिक दबाव के कारण आयोजकों को पीछे हटना पड़ा और अंततः शंकराचार्य को सड़क पर रुकना पड़ा। यदि यह आरोप सत्य हैं तो यह केवल एक संत का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का भी अपमान है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों?
यदि अनुमति नहीं थी तो कार्यक्रम तय कैसे हुआ? यदि सुरक्षा संबंधी चिंताएं थीं तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई? यदि प्रशासन का पक्ष सही है तो वह सार्वजनिक रूप से सामने आकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर रहा? और यदि आरोपों में सच्चाई है तो फिर यह घटना प्रशासनिक संवेदनहीनता का गंभीर उदाहरण बन जाती है।
विडंबना यह है कि जब किसी धार्मिक आयोजन में लाखों लोगों की भीड़ जुटती है तो व्यवस्था उसे अपनी उपलब्धि बताती है। लेकिन जब किसी शंकराचार्य की यात्रा की बात आती है तो वही व्यवस्था अनुमति और नियमों के पीछे खड़ी दिखाई देती है। नियम आवश्यक हैं, लेकिन नियमों के पीछे छिपकर सम्मान और संवाद की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
सवाल यह भी है कि क्या आज का प्रशासन उन लोगों को सहज स्वीकार कर पाता है जो सत्ता से असहमति रखते हैं? शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले कुछ समय से विभिन्न मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछते रहे हैं। कभी गौ संरक्षण को लेकर, कभी धार्मिक मामलों को लेकर और कभी कानून-व्यवस्था को लेकर। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं बल्कि अधिकार है। लेकिन यदि प्रश्न पूछने वालों के प्रति प्रशासनिक व्यवहार बदलता दिखाई दे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।
भारत का इतिहास बताता है कि सिंहासन और संतों के बीच हमेशा संवाद रहा है। जब-जब सत्ता अहंकार में आई, संतों ने उसे आईना दिखाया। और जब-जब संतों का अपमान हुआ, समाज ने उसे केवल व्यक्ति का नहीं बल्कि संस्कृति का अपमान माना। यही कारण है कि कन्नौज की यह घटना केवल एक रात की कहानी नहीं है। यह उस टकराव का प्रतीक बन रही है जिसमें व्यवस्था और परंपरा आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही हैं।
सरकार को समझना होगा कि सनातन केवल चुनावी भाषणों का विषय नहीं है। सनातन करोड़ों लोगों की आस्था है। उसका सम्मान केवल मंदिरों के निर्माण या धार्मिक नारों से नहीं होता। उसका सम्मान तब होता है जब उसके प्रतिनिधियों के साथ गरिमा और संवेदनशीलता का व्यवहार किया जाए।
आज कन्नौज की सड़क पर बैठा एक शंकराचार्य पूरे तंत्र से सवाल पूछ रहा है। सवाल किसी भवन, विद्यालय या अनुमति का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में संतों का सम्मान अब प्रशासनिक स्वीकृति का मोहताज हो गया है? क्या सनातन का गौरव केवल मंचों तक सीमित रह गया है? और क्या सत्ता का अहंकार संवाद की जगह लेने लगा है?
इन सवालों के जवाब जितनी जल्दी मिलेंगे, लोकतंत्र और संस्कृति दोनों के लिए उतना ही बेहतर होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है कि सत्ता की उम्र सीमित होती है, लेकिन संस्कृति और संत परंपरा शाश्वत होती है।


