लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उत्तर पूर्व रेलवे (एनईआर) द्वारा कोंकण रेलवे कॉरपोरेशन लिमिटेड की तकनीकी बोली खारिज किए जाने की कार्रवाई को अनुचित ठहराया है। अदालत ने कहा कि केवल स्टांप ड्यूटी की कमी जैसी सुधार योग्य तकनीकी खामी के आधार पर किसी बोलीदाता को टेंडर प्रक्रिया से बाहर करना न्यायसंगत नहीं है।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए एनईआर द्वारा तैयार वित्तीय बोलियों की टेबुलेशन को निरस्त कर दिया और सभी पात्र निविदाकारों की वित्तीय बोलियों पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही कोंकण रेलवे को तीन जून तक स्टांप ड्यूटी की कमी पूरी करने का अवसर भी दिया गया है।
मामला रेलवे विद्युतीकरण परियोजना के एक टेंडर से जुड़ा है, जिसमें कोंकण रेलवे की तकनीकी बोली को पात्रता शर्तें पूरी न करने का हवाला देकर खारिज कर दिया गया था। कंपनी ने आरोप लगाया कि उसे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। बाद में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रेलवे प्रशासन ने स्टांप शुल्क में कमी को बोली खारिज करने का आधार बताया।
याची की ओर से दलील दी गई कि स्टांप ड्यूटी की कमी कोई गंभीर कानूनी बाधा नहीं बल्कि सुधार योग्य त्रुटि है और केवल इसी आधार पर बोली को खारिज करना उचित नहीं है। अदालत ने भी माना कि प्रारंभिक अस्वीकृति पत्र में कारणों का उल्लेख नहीं किया गया था और बाद में नए कारण जोड़ने का प्रयास कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी संस्थाएं टेंडर प्रक्रिया में समान अवसर, निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं तथा उनके निर्णय मनमाने नहीं होने चाहिए। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि उपलब्ध तथ्यों से प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि सबसे कम वित्तीय बोली (एल-1) देने वाले याची को प्रक्रिया से बाहर करने का प्रयास किया गया।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एल-1 बोलीदाता होने से किसी कंपनी को ठेका मिलने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अंततः हाईकोर्ट ने वित्तीय बोलियों पर पुनर्विचार का आदेश देते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।


