– टाटा-रैलीज इंडिया की लीज, मौत के बाद पावर ऑफ अटॉर्नी और सौदों पर उठे सवाल
फर्रुखाबाद। जिले की सबसे चर्चित औद्योगिक संपत्तियों में शामिल लिंजीगंज क्षेत्र की बहुमूल्य भूमि और गोदामों से जुड़ा मामला अब कथित तौर पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर पहुंच गया है। वर्षों से दबे इस प्रकरण में जमीन के स्वामित्व, लीज, पावर ऑफ अटॉर्नी और बाद में हुए सौदों को लेकर जाँच शुरू हुईं है ।
सूत्रों के अनुसार, रैलीज इंडिया लिमिटेड और टाटा केमिकल फर्टिलाइजर लिमिटेड से जुड़ी भूमि और गोदामों का मामला जांच के दायरे में है। बताया जाता है कि जिन गोदामों में कभी ग्रो-मोर फर्टिलाइजर समेत अन्य उत्पादों का निर्माण और भंडारण होता था, उनकी लीज वर्ष 2030 तक प्रभावी थी। लीज अवधि समाप्त होने से काफी पहले ही इन परिसंपत्तियों के स्वामित्व और हस्तांतरण को लेकर विवादित प्रक्रियाएं अपनाई गईं।
मामले में सबसे बड़ा सवाल उस कथित पावर ऑफ अटॉर्नी पर उठ रहा है, जिसके आधार पर जमीन के सौदे किए जाने की बात सामने आई है। जांच से जुड़े सूत्रों का दावा है कि मूल मालिक उमेश चंद्र साध के मृत्यु प्रमाण पत्र से जुड़े दस्तावेज एजेंसियों के हाथ लगे हैं। आरोप यह है कि संबंधित व्यक्ति की मृत्यु के वर्षों बाद भी पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर भूमि का विक्रय किया गया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में पावर ऑफ अटॉर्नी देने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। ऐसे में यदि मृत्यु के बाद संपत्ति के हस्तांतरण या विक्रय की प्रक्रिया हुई है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों और न्यायालय के निर्णय पर ही निर्भर करेगा।
सूत्रों के मुताबिक इस प्रकरण में राजीव कुमार, सरदार गुरमीत सिंह और रवि रस्तोगी के नाम भी चर्चा में हैं। वहीं तत्कालीन प्रशासनिक निर्णयों और राजस्व अभिलेखों की भी जांच किए जाने की बात सामने आ रही है।
मामला केवल फतेहगढ़ तक सीमित नहीं बताया जा रहा। सदर तहसील के गांव ढिलावल में हुई कुछ भूमि खरीद-फरोख्त और उससे जुड़े प्रशासनिक अनुमोदनों की भी जांच होने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि पूर्व में हुए कुछ भूमि सौदों के दस्तावेजों का पुनः परीक्षण किया जा रहा है।
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस पूरे प्रकरण को जिले के सबसे बड़े भूमि विवादों में से एक माना जा रहा है। यदि जांच एजेंसियों को दस्तावेजी स्तर पर अनियमितताओं के प्रमाण मिलते हैं तो कई वर्षों पुराने फैसले, रजिस्ट्री, नामांतरण और प्रशासनिक अनुमोदन सवालों के घेरे में आ सकते हैं।
फिलहाल मामले की आधिकारिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह पुराने दस्तावेजों, लीज रिकॉर्ड, मृत्यु प्रमाण पत्रों और पावर ऑफ अटॉर्नी से जुड़े अभिलेखों की पड़ताल की चर्चा है, उससे साफ है कि फर्रुखाबाद की यह बहुचर्चित जमीन आने वाले दिनों में बड़े खुलासों का कारण बन सकती है।


