भरत चतुर्वेदी
घास से पूछिए कि जंगल का सबसे बड़ा खलनायक कौन है, तो वह शेर का नाम नहीं लेगी। वह कहेगी कि हिरन उसका सबसे बड़ा दुश्मन है, क्योंकि हिरन उसे खाता है। और यदि उससे पूछा जाए कि उसका रक्षक कौन है, तो संभव है वह शेर का नाम ले, क्योंकि शेर हिरन का शिकार करता है।
यहीं से जीवन का एक गहरा सत्य सामने आता है दुनिया वैसी नहीं दिखती जैसी वह वास्तव में है, बल्कि वैसी दिखती है जैसी हमारी स्थिति, हमारे हित, हमारे अनुभव और हमारा दृष्टिकोण उसे देखने की अनुमति देते हैं।
इंसान का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह अपने नजरिये को ही अंतिम सत्य मान लेता है। उसे लगता है कि जो वह देख रहा है, वही वास्तविकता है। जबकि सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के चश्मे से दुनिया को देखता है। एक ही घटना किसी के लिए न्याय हो सकती है और किसी दूसरे के लिए अन्याय।
राजनीति में यही होता है। जिस नेता को एक वर्ग मसीहा मानता है, दूसरा वर्ग उसी को खलनायक घोषित कर देता है। व्यापार में जिस निर्णय को कंपनी विकास का कदम बताती है, कर्मचारी उसे अपने हितों पर हमला समझ सकते हैं। परिवारों में भी अक्सर विवाद इसलिए नहीं होते कि कोई गलत है, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि हर व्यक्ति अपनी जगह से खुद को सही मान रहा होता है।
समस्या तब पैदा होती है जब हम अपने नजरिये को ही पूर्ण सत्य मानकर दूसरों के विचारों को खारिज कर देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सामने वाला भी अपनी परिस्थितियों के आधार पर सोच रहा है। उसकी कहानी, उसके संघर्ष, उसके अनुभव और उसकी जरूरतें हमसे अलग हैं। इसलिए उसका निष्कर्ष भी अलग होना स्वाभाविक है।
आज समाज में बढ़ती कटुता का एक बड़ा कारण यही है। लोग सुनना कम और फैसला सुनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वे समझने की कोशिश नहीं करते कि सामने वाला ऐसा क्यों सोच रहा है। परिणामस्वरूप संवाद की जगह टकराव और सहमति की जगह दुश्मनी पैदा हो जाती है।
प्रकृति हमें सिखाती है कि सत्य के कई आयाम होते हैं। नदी के किनारे खड़ा व्यक्ति नदी को अलग रूप में देखता है, नाव में बैठा व्यक्ति अलग रूप में और आसमान से देखने वाला व्यक्ति अलग रूप में। तीनों के अनुभव अलग हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तीनों झूठ बोल रहे हैं।
जीवन में परिपक्वता तब आती है जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारा नजरिया अंतिम नहीं है। हो सकता है हम सही हों, लेकिन यह भी संभव है कि सामने वाले की बात में भी कुछ सच्चाई हो। यही सोच हमें अधिक संवेदनशील, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय बनाती है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम हर किसी को अपने नजरिये से दुनिया दिखाएं, बल्कि यह है कि कभी-कभी हम दूसरों की आंखों से भी दुनिया देखने की कोशिश करें। क्योंकि कई बार सच वहां दिखाई देता है, जहां हमारा अहंकार देखने से इंकार कर देता है।
याद रखिए, घास के लिए हिरन राक्षस हो सकता है और शेर रक्षक, लेकिन जंगल का पूरा सच केवल घास की नजर से नहीं समझा जा सकता। इसी तरह जीवन, समाज और दुनिया को समझने के लिए हमें अपने दृष्टिकोण की सीमाओं से बाहर निकलना होगा।
बात बस नज़रिये की होती है।
जो व्यक्ति यह समझ लेता है, वह लोगों को जज करने से पहले उन्हें समझना सीख जाता है। और यही समझ इंसान को भीड़ से अलग, अधिक बुद्धिमान और अधिक मानवीय बनाती है।


