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Thursday, May 28, 2026

शिक्षा व्यवस्था की साख पर सबसे बड़ा सवाल, क्या “डिजिटल मूल्यांकन” छात्रों का भविष्य निगल रहा है?

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शरद कटियार

देश की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्थाओं में गिने जाने वाले सीबीएसई बोर्ड को लेकर उठे ताजा विवाद ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्लास 12वीं के मूल्यांकन में कथित तकनीकी गड़बड़ियों और बड़े स्तर पर हुई विसंगतियों को खुद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा स्वीकार करना केवल एक प्रशासनिक बयान नहीं बल्कि उस संकट की आधिकारिक पुष्टि है, जिसे लाखों छात्र और अभिभावक पिछले कई दिनों से महसूस कर रहे थे।

करीब 40 करोड़ उत्तर पुस्तिका पन्नों की जांच प्रक्रिया में गड़बड़ी की चर्चा अपने आप में बेहद गंभीर मामला है। यह केवल अंक कम या ज्यादा आने का मुद्दा नहीं बल्कि उस भरोसे का संकट है, जिस पर देश की पूरी परीक्षा प्रणाली टिकी हुई है। हर साल करोड़ों छात्र अपनी मेहनत, सपनों और भविष्य को परीक्षा परिणामों से जोड़ते हैं। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान छात्रों के मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास को होता है।

डिजिटल मूल्यांकन को शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और तेजी लाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। दावा किया गया था कि तकनीक मानव त्रुटियों को कम करेगी और निष्पक्षता बढ़ाएगी। लेकिन अब यदि उसी डिजिटल सिस्टम में “झोल” की बात सामने आ रही है, तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं बल्कि नीति निर्माण और निगरानी तंत्र की भी असफलता मानी जाएगी।

शिक्षा मंत्री का यह कहना कि “एक भी छात्र के साथ अन्याय नहीं होने देंगे” निश्चित रूप से राहत देने वाला बयान है, लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? क्या देश की सबसे बड़ी बोर्ड परीक्षा की मूल्यांकन प्रक्रिया बिना पर्याप्त परीक्षण और निगरानी के संचालित की गई? यदि लाखों छात्रों को अपने अंकों पर संदेह है, तो इसका मतलब केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि सिस्टम में गहरे अविश्वास की स्थिति पैदा हो चुकी है।

आज देश का छात्र पहले ही प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती घोटालों और अनिश्चित भविष्य के दबाव से जूझ रहा है। NEET, भर्ती परीक्षाओं और अब CBSE मूल्यांकन विवाद ने युवाओं के मन में यह डर बैठा दिया है कि मेहनत से ज्यादा सिस्टम की खामियां उनके भविष्य का फैसला कर रही हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और विकसित राष्ट्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बना रहा है, लेकिन सरकार के लिए यह केवल राजनीतिक चुनौती नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का विषय भी है। यदि वास्तव में बड़े स्तर पर गड़बड़ियां हुई हैं, तो केवल री-इवैल्युएशन शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि पूरी मूल्यांकन प्रणाली की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा हो, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो और भविष्य के लिए मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए।

शिक्षा केवल अंकपत्र नहीं होती, बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियाद होती है। यदि छात्र अपने ही परिणामों पर भरोसा खोने लगें, तो यह किसी भी सरकार और व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। देश को केवल डिजिटल शिक्षा नहीं बल्कि भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है, जहां तकनीक सुविधा बने, संकट नहीं।

फिलहाल सीबीएसई विवाद ने यह साफ कर दिया है कि भारत की शिक्षा प्रणाली एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां केवल सुधार के दावे नहीं बल्कि ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत है। क्योंकि सवाल केवल कॉपियों का नहीं, करोड़ों युवाओं के भविष्य और विश्वास का है।

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