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Monday, May 25, 2026

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई आम आदमी की चिंता

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11 दिनों में 7 रुपये की बढ़ोतरी

नई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ रही महंगाई के बीच पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी ने आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पिछले 11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दामों में ₹7 प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि हो चुकी है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतों में और इजाफा हो सकता है। बढ़ती ईंधन कीमतों का सीधा असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं पर पड़ रहा है।

सरकारी तेल कंपनियों द्वारा सोमवार को एक बार फिर ईंधन के दाम बढ़ाए गए। यह पिछले 11 दिनों में चौथी बढ़ोतरी है। इसके बावजूद इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां भारी घाटे से जूझ रही हैं। बताया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी के कारण कंपनियों को लंबे समय तक नुकसान उठाना पड़ा।

जानकारी के अनुसार पहले ₹3, फिर 90 पैसे, उसके बाद 87 पैसे और हाल ही में ₹2.61 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों के पुराने घाटे की भरपाई अभी भी नहीं हो सकी है। अनुमान है कि वास्तविक लागत और बिक्री मूल्य के बीच अंतर खत्म करने के लिए पेट्रोल-डीजल के दामों में अभी और वृद्धि की आवश्यकता पड़ सकती है।

ईरान संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। हालांकि भारत में 74 दिनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी गईं, जिससे तेल कंपनियों को भारी नुकसान हुआ। बताया जा रहा है कि तीनों सरकारी तेल कंपनियों का कुल घाटा ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गया था।

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर किसी भी भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी गिरावट जरूर दर्ज की गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

सरकार के सामने फिलहाल बड़ी चुनौती आम जनता को राहत देने और तेल कंपनियों के घाटे के बीच संतुलन बनाने की है। बढ़ती कीमतों से जहां आम आदमी परेशान है, वहीं तेल कंपनियां लगातार आर्थिक दबाव में बनी हुई हैं।

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