32 C
Lucknow
Thursday, May 21, 2026

सड़कों पर नमाज को लेकर बहस तेज, योगी के बयान पर मुस्लिम धर्मगुरुओं में समर्थन और विरोध दोनों

Must read

 

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सार्वजनिक स्थानों पर नमाज को लेकर दिए गए बयान के बाद प्रदेश में सियासी और धार्मिक बहस तेज हो गई है। जहां कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मस्जिदों और ईदगाहों में ही नमाज अदा करने की बात कहकर मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन किया, वहीं कुछ धर्मगुरुओं ने इसे राजनीतिक टिप्पणी बताते हुए सभी समुदायों पर समान नियम लागू करने की मांग उठाई है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में कहा था कि यदि नमाज पढ़ना आवश्यक है तो इसे मस्जिदों के भीतर अदा किया जाए और सड़कों पर नमाज की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने सुझाव दिया था कि भीड़ अधिक होने पर अलग-अलग समय में नमाज कराई जा सकती है। इस बयान के बाद ईद-उल-अजहा को लेकर तैयारियों के बीच मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि मुसलमान वर्षों से मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज अदा करते आ रहे हैं और कानून-व्यवस्था का पालन करना उनकी परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर अलग-अलग समय पर नमाज की व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को सभी समुदायों पर समान नियम लागू करने चाहिए।

वहीं ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि शिया परंपरा में अलग-अलग समय में सामूहिक नमाज का प्रावधान नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि किसी एक धर्म की गतिविधियों को निशाना बनाना उचित नहीं है और यातायात बाधित करने वाले सभी धार्मिक आयोजनों पर समान रूप से नियम लागू होने चाहिए।

दूसरी ओर बरेलवी संप्रदाय के कई प्रमुख धर्मगुरुओं ने मुख्यमंत्री के बयान का खुलकर समर्थन किया। शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने कहा कि नमाज शांति और स्वच्छता वाले स्थान पर ही अदा की जानी चाहिए और सड़कें इसके लिए उपयुक्त नहीं हैं। बरेली की जामा मस्जिद के इमाम मौलाना खुर्शीद ने भी कहा कि मुख्यमंत्री ने कुछ गलत नहीं कहा और इस निर्देश का पहले भी पालन होता रहा है।हालांकि अमरोहा के मदरसा इस्लामिया अरबिया जामा मस्जिद के प्राचार्य सैय्यद मोहम्मद अफान मंसूरपुरी ने मुख्यमंत्री के बयान को राजनीतिक बताते हुए कहा कि मुसलमान पहले से ही सरकारी निर्देशों का पालन करते हैं, लेकिन इस तरह की टिप्पणियां बहुसंख्यक समुदाय को खुश करने के उद्देश्य से की जाती हैं।ईद-उल-अजहा 28 मई को मनाई जाएगी और उससे पहले नमाज को लेकर उठी यह बहस अब राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गई है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article