– पैसे लेकर नेताओं का प्रचार, जनता के मुद्दों पर चुप
– डिजिटल दलाली का नया चेहरा बने कई इन्फ्लुएंसर
लखनऊ ।
देश में सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव अब लोकतंत्र, राजनीति और समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। जिस सोशल मीडिया को कभी जनजागरूकता और अभिव्यक्ति की ताकत माना गया था, वहीं अब यह “पेड प्रोपेगेंडा” और “डिजिटल दलाली” का बड़ा हथियार बन चुका है। आज हालात यह हैं कि सैकड़ो छोटे-बड़े इन्फ्लुएंसर 2 से 10 हजार रुपये लेकर नेताओं, दागी कारोबारियों और विवादित संस्थानों की झूठी छवि चमकाने में जुटे हैं।
रील्स, वायरल वीडियो और स्क्रिप्टेड इंटरव्यू के जरिए जनता तक आधा सच और पूरा झूठ पहुंचाया जा रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह खेल सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब जनता की सोच, चुनावी माहौल और सामाजिक धारणा को प्रभावित करने का माध्यम बन चुका है।
सोशल मीडिया पर रोजाना हजारों ऐसी रील्स वायरल होती हैं जिनमें नेता खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताते नजर आते हैं। कहीं टूटी सड़क के सामने खड़े होकर “विकास” का दावा किया जाता है, तो कहीं अधूरी योजनाओं को “ऐतिहासिक उपलब्धि” बताकर प्रचारित किया जाता है। कैमरे के सामने चमकदार वीडियो बनाई जाती हैं, लेकिन कैमरा हटते ही वही इलाके बदहाल नजर आते हैं।
डिजिटल मार्केटिंग से जुड़े सूत्रों के अनुसार छोटे शहरों के लोकल इन्फ्लुएंसर 2 हजार से 10 हजार रुपये तक में “पॉजिटिव कंटेंट” बनाते हैं। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर फॉलोअर्स के हिसाब से रेट तय होता है। चुनावी समय में यही रकम कई गुना बढ़ जाती है। कई संस्थान अपनी खराब छवि छिपाने और नकारात्मक खबरों को दबाने के लिए भी सोशल मीडिया प्रचार खरीदते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग का मूल उद्देश्य जानकारी और जनजागरूकता था, लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा “डिजिटल दलाली” में बदलता जा रहा है। कई इन्फ्लुएंसर बिना तथ्य जांचे प्रचार करते हैं, पैसे लेकर राजनीतिक पक्ष लेते हैं, फर्जी उपलब्धियां दिखाते हैं और विरोधी खबरों को दबाने का काम करते हैं। कुछ मामलों में ट्रोल गैंग के जरिए सवाल उठाने वालों को निशाना भी बनाया जाता है।
सबसे ज्यादा निशाने पर युवा वर्ग है। 10 से 20 सेकेंड की चमकदार रील्स में नेताओं को “मसीहा” की तरह दिखाया जाता है, जबकि उसी क्षेत्र में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध और बदहाल व्यवस्थाओं की खबरें दबा दी जाती हैं। भावनात्मक संगीत, बड़े-बड़े संवाद और एडिटेड वीडियो के जरिए युवाओं की सोच को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।
विभिन्न डिजिटल रिपोर्टों के अनुसार भारत में 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट यूजर हैं। करोड़ों युवा रोजाना इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर घंटों समय बिताते हैं। राजनीतिक दल अब टीवी विज्ञापन से ज्यादा सोशल मीडिया प्रचार पर खर्च कर रहे हैं। माइक्रो इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है और यही वजह है कि “मोबाइल स्क्रीन” अब जनता तक पहुंचने का सबसे तेज और सस्ता हथियार बन चुकी है।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब भ्रष्टाचार, लापरवाही और जनता विरोधी कामों को भी “जनसेवा” बताकर वायरल कराया जाता है। कई मामलों में अस्पतालों, शिक्षा संस्थानों, बिल्डरों और राजनीतिक संगठनों ने सोशल मीडिया प्रचार के जरिए अपनी खराब छवि छिपाने की कोशिश की। एक तरफ जनता सड़क, बिजली, पानी, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं से जूझती रहती है, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर “सब अच्छा है” का माहौल बनाया जाता है।
मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब सच और प्रचार के बीच की सीमा खत्म होने लगे। आज सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चमकदार वीडियो सच्चाई नहीं होती। कई वीडियो स्क्रिप्टेड होती हैं, कई आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं और कई उपलब्धियां सिर्फ कैमरे तक सीमित होती हैं।
अब सवाल यह है कि आखिर जनता कब जागेगी? क्योंकि हर वायरल वीडियो सच नहीं होता, हर मुस्कुराता नेता ईमानदार नहीं होता और हर इन्फ्लुएंसर निष्पक्ष नहीं होता। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता कैमरे की चमक नहीं, जमीन की सच्चाई देखना शुरू करेगी।
वरना आने वाले समय में सच अदालतों, पत्रकारिता और जनसंवाद में नहीं, बल्कि पैसों से खरीदी गई रील्स और प्रायोजित वीडियो में तय किया जाएगा।


