42 C
Lucknow
Wednesday, May 20, 2026

उत्तर प्रदेश की सड़कें अतिक्रमण के शिकंजे में, जाम और अव्यवस्था से त्रस्त हो रही जनता

Must read

 

उत्तर प्रदेश के शहर तेजी से फैल रहे हैं, बाजार बढ़ रहे हैं, वाहन बढ़ रहे हैं और आबादी का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन जिस गति से विकास होना चाहिए था, उसी अनुपात में यातायात व्यवस्था और शहरी प्रबंधन मजबूत नहीं हो पाया। परिणाम यह है कि प्रदेश के अधिकांश शहर आज अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और भीषण जाम की समस्या से कराह रहे हैं। राजधानी लखनऊ से लेकर कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, मेरठ, आगरा, गोरखपुर, बरेली और छोटे जिलों तक सड़कें अब यातायात के लिए कम और कब्जों के लिए ज्यादा उपयोग में दिखाई देती हैं।

प्रदेश के शहरों में सबसे बड़ी समस्या यह बन चुकी है कि फुटपाथ पूरी तरह गायब हो चुके हैं। जिन रास्तों पर पैदल चलने वालों के लिए जगह होनी चाहिए थी, वहां दुकानों का सामान, ठेले, अवैध निर्माण और पार्किंग ने कब्जा जमा लिया है। सड़कें धीरे-धीरे सिकुड़ती चली गईं और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई बाजारों में दोपहिया वाहन निकालना तक चुनौती बन गया है। थोड़ी सी भी भीड़ बढ़ते ही कई किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है।

सबसे गंभीर स्थिति यह है कि जाम अब केवल असुविधा नहीं, बल्कि जनसुरक्षा का संकट बन चुका है। एंबुलेंस समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पातीं, फायर ब्रिगेड को रास्ता नहीं मिलता और स्कूली बच्चे घंटों सड़कों पर फंसे रहते हैं। प्रदेश के कई शहरों में ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं जहां जाम के कारण मरीजों की हालत गंभीर हो गई। इसके बावजूद प्रशासनिक तंत्र केवल अभियान चलाने और फोटो खिंचवाने तक सीमित नजर आता है।

वास्तविकता यह है कि अतिक्रमण अब केवल स्थानीय समस्या नहीं रह गया, बल्कि यह राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक ढिलाई और भ्रष्ट तंत्र का प्रतीक बन चुका है। नगर निगम, विकास प्राधिकरण, यातायात पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती। जब कभी अतिक्रमण हटाओ अभियान चलता भी है तो कुछ दिनों बाद वही कब्जे फिर खड़े दिखाई देने लगते हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि कार्रवाई स्थायी समाधान के बजाय केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।

प्रदेश में अवैध पार्किंग भी एक बड़े कारोबार का रूप ले चुकी है। मुख्य बाजारों और चौराहों पर चार पहिया वाहन सड़क के बीचोंबीच खड़े कर दिए जाते हैं। कई जगहों पर दुकानदार स्वयं ग्राहकों के वाहनों को सड़क पर खड़ा कराते हैं, जिससे यातायात पूरी तरह प्रभावित होता है। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी के बावजूद नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ती रहती हैं। सवाल यह उठता है कि जब चौराहों पर पुलिस तैनात रहती है तो फिर अव्यवस्था पर नियंत्रण क्यों नहीं हो पाता।

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार स्मार्ट सिटी, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक यातायात व्यवस्था के दावे करती रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को चुनौती देती दिखाई देती है। शहरों का विस्तार बिना ठोस ट्रैफिक प्लानिंग के किया गया। पार्किंग व्यवस्था विकसित नहीं हुई, सार्वजनिक परिवहन मजबूत नहीं किया गया और सड़क किनारे अतिक्रमण रोकने के लिए दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई। यही कारण है कि हर शहर धीरे-धीरे ट्रैफिक अराजकता की गिरफ्त में आता जा रहा है।

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि आम नागरिकों ने भी नियमों की अनदेखी को आदत बना लिया है। सड़क पर कहीं भी वाहन खड़ा कर देना, दुकानों का सामान बाहर तक फैला देना और फुटपाथों को निजी संपत्ति समझ लेना अब सामान्य व्यवहार बन चुका है। जब तक प्रशासनिक सख्ती के साथ नागरिक जिम्मेदारी नहीं जुड़ेगी, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि प्रदेश स्तर पर अतिक्रमण और यातायात प्रबंधन के लिए कठोर और स्थायी नीति लागू की जाए। प्रत्येक शहर में वैज्ञानिक ट्रैफिक प्लान तैयार हो, मल्टीलेवल पार्किंग विकसित की जाए, फुटपाथों को कब्जामुक्त कराया जाए और अवैध पार्किंग पर भारी जुर्माना लगाया जाए। साथ ही नगर निकायों और पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए कि यदि किसी क्षेत्र में दोबारा अतिक्रमण होता है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा।

उत्तर प्रदेश यदि वास्तव में आधुनिक और व्यवस्थित शहरी विकास का मॉडल बनना चाहता है तो उसे सड़कों को कब्जों से मुक्त कराना ही होगा। क्योंकि विकास केवल चौड़ी सड़कें बनाने से नहीं होता, बल्कि उन सड़कों को आम जनता के लिए सुरक्षित और सुगम बनाए रखने से होता है। फिलहाल प्रदेश के शहरों की हालत यह बता रही है कि अव्यवस्था की रफ्तार प्रशासनिक इच्छाशक्ति से कहीं ज्यादा तेज हो चुकी है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article