नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अधिकारों की सीमा स्पष्ट कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी भी ज्यूडिशियल ऑफिसर के खिलाफ स्वतंत्र रूप से जांच शुरू करने या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार रजिस्ट्रार जनरल को नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई प्रारंभ करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा संबंधित उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस या जजों की समिति की अनुमति आवश्यक होगी। बिना सक्षम अनुमति के कोई भी डिसिप्लिनरी प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा बनाए रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तय नियमों और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप ही की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को न्यायपालिका के प्रशासनिक अधिकारों और अनुशासनात्मक प्रक्रिया की सीमा तय करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से न्यायिक अधिकारियों के मामलों में प्रक्रिया संबंधी स्पष्टता आएगी और मनमानी कार्रवाई पर रोक लगेगी।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक संस्थानों के भीतर अनुशासनात्मक अधिकारों का प्रयोग अत्यंत संतुलित और संवैधानिक मर्यादा के तहत होना चाहिए। फैसले के बाद न्यायिक और कानूनी हलकों में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है।
न्यायिक अधिकारियों पर कार्रवाई पर सीजेआई की मंजूरी अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट


