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Monday, May 18, 2026

अधिवक्ताओं पर लाठीचार्ज: क्या लोकतंत्र में संवाद की जगह दमन ले रहा है?

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राजीव वाजपेयी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह होती है कि यहां हर वर्ग को अपनी बात कहने, विरोध दर्ज कराने और न्याय मांगने का अधिकार होता है। लेकिन जब वही व्यवस्था अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे अधिवक्ताओं पर लाठियां बरसाने लगे, तब सवाल केवल एक घटना का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की संवेदनशीलता पर खड़ा होता है।
हाल ही में अधिवक्ताओं पर हुए लाठीचार्ज ने प्रदेश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों को झकझोर दिया है। अधिवक्ता समाज लंबे समय से अपनी मूलभूत समस्याओं को लेकर सरकार और प्रशासन के सामने आवाज उठाता रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त चैंबर, बैठने की व्यवस्था और न्यायालय परिसरों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव रहा है। वर्षों से मांग की जा रही है कि बढ़ती संख्या के अनुसार अधिवक्ताओं के लिए नए चैंबर और सुविधाएं विकसित की जाएं, लेकिन हर बार आश्वासन के अलावा कुछ ठोस जमीन पर दिखाई नहीं देता।
स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि कई बार न्यायालयों को सरकार को निर्देश देना पड़ता है। यह अपने आप में प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रमाण माना जाता है। सवाल यह है कि जब अधिवक्ता, जो न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलन करते हैं तो उनका समाधान संवाद से क्यों नहीं खोजा जाता? आखिर ऐसी नौबत क्यों आती है कि पुलिस बल प्रयोग करे और अधिवक्ताओं पर लाठियां चलें?
अधिवक्ता केवल एक पेशे से जुड़े लोग नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की आत्मा को जीवित रखने वाले महत्वपूर्ण प्रहरी हैं। न्यायालय और अधिवक्ता एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में अधिवक्ताओं के सम्मान और अधिकारों की अनदेखी केवल एक वर्ग की उपेक्षा नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गरिमा पर भी सवाल खड़े करती है।
प्रदेश में लगातार बढ़ती न्यायिक चुनौतियों और लंबित मामलों के बीच अधिवक्ताओं पर दबाव पहले ही बढ़ चुका है। कई जिलों में अधिवक्ता वर्षों से सीमित संसाधनों में काम करने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे कमरों में कई-कई वकीलों का बैठना, मूलभूत सुविधाओं का अभाव और प्रशासनिक उदासीनता आम बात बन चुकी है। ऐसे में यदि अधिवक्ता अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरते हैं तो इसे केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में विरोध को कुचलकर स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। यदि अधिवक्ताओं की समस्याओं को समय रहते गंभीरता से सुना जाता, न्यायालय परिसरों के विस्तार और सुविधाओं पर ठोस कार्य होता, तो शायद ऐसी टकराव की स्थिति ही पैदा नहीं होती।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और न्यायिक प्रशासन संवाद का रास्ता अपनाएं। अधिवक्ताओं की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाए और ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो, ताकि भविष्य में लोकतंत्र के प्रहरी खुद को असुरक्षित महसूस न करें।

क्योंकि जब न्याय मांगने वाले ही सड़कों पर लाठियां खाने लगें, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी बन जाती है।
लेखक फतेहगढ़ कोर्ट में अधिवक्ता हैं।

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