शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल मंत्रिमंडल विस्तार से नहीं चलती, बल्कि असली संदेश विभागों के बंटवारे में छिपा होता है। योगी सरकार के हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद जब नए मंत्रियों के विभाग घोषित हुए, तो यह स्पष्ट हो गया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं किया, बल्कि इसके जरिए कई राजनीतिक संकेत भी दिए हैं। यह बंटवारा बताता है कि सरकार के भीतर शक्ति संतुलन कैसे साधा जा रहा है, कौन नेता मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में है और किन चेहरों को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया जा रहा है।
सबसे अधिक चर्चा बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी को मिले एमएसएमई विभाग को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा था कि उन्हें लोक निर्माण विभाग जैसा बड़ा मंत्रालय मिल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहली नजर में इसे सीमित राजनीतिक महत्व वाला विभाग माना जा सकता है, लेकिन गहराई से देखें तो यही विभाग आने वाले समय में सबसे प्रभावशाली साबित हो सकता है। रोजगार, उद्योग, स्टार्टअप और स्वरोजगार की योजनाओं के जरिए यह मंत्रालय सीधे युवाओं और छोटे कारोबारियों तक पहुंच रखता है। ऐसे में योगी सरकार ने भूपेंद्र चौधरी को सत्ता के केंद्र से दूर नहीं किया, बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक प्रभाव वाले क्षेत्र में स्थापित किया है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी से आए मनोज पाण्डेय को खाद्य एवं रसद तथा नागरिक आपूर्ति जैसा बड़ा विभाग देकर बीजेपी ने विपक्ष को साफ राजनीतिक संदेश दिया है। यह केवल विभाग देना नहीं, बल्कि सपा के भीतर यह संदेश भेजना भी है कि बीजेपी में आने वालों को राजनीतिक सम्मान और ताकत दोनों मिल सकते हैं। राशन व्यवस्था और सार्वजनिक वितरण प्रणाली वाला यह विभाग गांव से शहर तक करोड़ों लोगों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में मनोज पांडेय को यह जिम्मेदारी सौंपना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
योगी सरकार ने इस पूरे बंटवारे में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की भी कोशिश की है। पिछड़े, दलित और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए मंत्रियों को विभाग दिए गए हैं। कृष्णा पासवान, कैलाश सिंह राजपूत और सुरेंद्र दिलेर जैसे नेताओं को जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश की है। यह वही रणनीति है जिस पर बीजेपी पिछले कुछ वर्षों से लगातार काम कर रही है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह रही कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़े और प्रभावशाली मंत्रालयों में व्यापक बदलाव नहीं किया। गृह, लोक निर्माण, वित्त और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख विभागों का मूल नियंत्रण पुराने ढांचे में ही रखा गया। इससे साफ संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री प्रशासनिक पकड़ को कमजोर करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने नए चेहरों को अवसर तो दिया, लेकिन सत्ता का वास्तविक नियंत्रण अपने विश्वस्त दायरे में ही बनाए रखा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा मंत्रिमंडलीय संतुलन 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। बीजेपी जानती है कि आने वाला चुनाव केवल हिंदुत्व या संगठन के भरोसे नहीं जीता जा सकता। रोजगार, सामाजिक संतुलन, क्षेत्रीय नेतृत्व और विपक्षी दलों में सेंधमारी — इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। यही वजह है कि विभागों के इस बंटवारे में राजनीतिक गणित साफ दिखाई देता है।
यह भी स्पष्ट है कि बीजेपी अब केवल परंपरागत नेताओं पर निर्भर रहने के बजाय नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर रही है। विपक्षी दलों से आने वाले नेताओं को महत्व देकर पार्टी यह दिखाना चाहती है कि उसकी राजनीति का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वहीं पुराने नेताओं को पूरी तरह किनारे भी नहीं किया गया, जिससे संगठन में असंतोष की स्थिति न बने।
योगी सरकार के इस विभागीय बंटवारे ने एक बात और स्पष्ट कर दी है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अंतिम निर्णय का केंद्र अभी भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही हैं। विभागों के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया है कि सरकार में अवसर सबको मिल सकता है, लेकिन शक्ति का संतुलन और नियंत्रण पूरी तरह नेतृत्व के हाथ में रहेगा।


