नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाए जाने के फैसले का विरोध करते हुए इसे संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया है। संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि जमीयत इस मुद्दे को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाएगी और कानूनी लड़ाई लड़ेगी।
मौलाना अरशद मदनी ने बयान जारी करते हुए कहा कि देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार जीवन जीने और आस्था की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उनका कहना है कि किसी भी धार्मिक या वैचारिक विषय को अनिवार्य बनाना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद राष्ट्रविरोधी नहीं है और देश के संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरा विश्वास रखती है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर संगठन अपनी आवाज उठाता रहेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसलों से समाज में अनावश्यक विवाद पैदा हो सकते हैं।
वहीं इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी तेज हो गई है। कुछ संगठनों और नेताओं ने वंदे मातरम् को राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बताते हुए इसका समर्थन किया है, जबकि कुछ पक्ष इसे व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मामला अदालत पहुंचता है तो संविधान के मौलिक अधिकारों और राज्य की शक्तियों को लेकर विस्तृत बहस देखने को मिल सकती है। फिलहाल इस मुद्दे को लेकर देशभर में चर्चाओं का दौर जारी है।


