यूथ इंडिया संवाददाता
लखनऊ। समाजवादी परिवार के छोटे बेटे प्रतीक यादव की मौत के बाद अब परिवार के भीतर के रिश्तों और राजनीतिक मतभेदों को लेकर नई चर्चाएं सामने आने लगी हैं। सूत्रों और करीबी लोगों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि भाजपा नेत्री अपर्णा यादव की राजनीतिक सक्रियता और समाजवादी परिवार से बढ़ती वैचारिक दूरी ने प्रतीक यादव को भीतर तक आहत कर दिया था।
चर्चा उस घटना की भी हो रही है जब महिला बिल के मुद्दे को लेकर विधानसभा के सामने समाजवादी पार्टी का झंडा जलाने का मामला सुर्खियों में आया था। बताया जाता है कि इस घटना से प्रतीक यादव बेहद नाराज हुए थे। करीबी सूत्रों के अनुसार उन्होंने साफ कहा था कि नेताजी के बनाए झंडे का अपमान शोभा नहीं देता। क्योंकि मुलायम सिंह यादव सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं बल्कि परिवार की पहचान और विरासत थे।
सूत्रों का दावा है कि प्रतीक यादव कभी नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी समाजवादी विचारधारा छोडक़र दूसरी पार्टी में जाएं। उन्हें यह भी पसंद नहीं था कि अपर्णा छोटे राजनीतिक कार्यक्रमों और स्थानीय नेताओं के बीच सक्रिय होकर अपनी अलग राजनीतिक लाइन तैयार करें। परिवार के करीबी लोग बताते हैं कि प्रतीक हमेशा चाहते थे कि परिवार एकजुट रहे और नेताजी की विरासत को लेकर सार्वजनिक टकराव न दिखे।
चर्चाओं में अपर्णा यादव के भाई अमन बिष्ट का नाम भी सामने आ रहा है। दावा किया जा रहा है कि परिवार के निजी और राजनीतिक मामलों में उनका हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा था, जिससे दूरी और तनाव की स्थिति पैदा हुई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन समाजवादी खेमे में इसको लेकर कानाफूसी तेज है।
करीबी लोगों के मुताबिक प्रतीक यादव कई बार सार्वजनिक और निजी बातचीत में कहते थे कि अखिलेश यादव उनके बड़े भाई हैं और वह हमेशा उनका सम्मान करेंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने कई मौकों पर यह भी कहा था कि हमारे नेता जी यानी अखिलेश यादव का वह पूरा सहयोग करेंगे।
बताया जाता है कि जब तक नेताजी मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता परिवार में सक्रिय रहीं, तब तक प्रतीक यादव सैफई परिवार के लगभग हर कार्यक्रम में मौजूद रहते थे। वह अखिलेश यादव के साथ भी दिखाई देते थे और परिवार के भीतर दूरी जैसी स्थिति खुलकर सामने नहीं आती थी। लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और प्रतीक धीरे-धीरे परिवार से अलग-थलग पड़ते गए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला सिर्फ पति-पत्नी के मतभेदों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाजवादी विरासत, राजनीतिक पहचान और परिवार के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की कहानी भी बन चुका था। अब प्रतीक यादव की मौत के बाद इन पुराने मतभेदों और घटनाओं को नए संदर्भ में देखा जा रहा है।
नेताजी के झंडे से शुरू हुई दूरी? प्रतीक यादव की चुप पीड़ा अब बन रही बड़ी राजनीतिक चर्चा


